महात्मा गाँधी

महात्मा गाँधी राजनीतिक और आर्थिक शक्तियों के विकेंद्रीकरण के पक्षधर थे।वे प्रौद्योगिकी के आधुनिकीकरण और बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण की ओर परंपरागत रूप से अनिच्छा का भाव रखते थे लेकिन उसके विकल्प के रूप में आर्थिक स्वावलंबन पर ज़ोर देते थे जो उनके ग्राम स्वराज का आधार भी है।गांधी मनुष्य और समाज का नैतिक विकास उसके राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास की बुनियाद में अनिवार्य मानते हैं। अहिंसा, मानवीय स्वतंत्रता, समानता तथा न्याय के प्रति प्रतिबद्धता और जीवन मे हमेशा सत्य का परीक्षण करते रहना ही गांधी का समाजवाद है।

महात्मा गाँधी के समाजवाद का उद्देश्य है-

1-स्वराज

2-आर्थिक विकेंद्रीकरण

3-सभी धर्मों में परस्पर एकता और सद्भाव

4-सामाजिक असमानता का समूल नाश

5-सर्वोदय

महात्मा गाँधी के समाजवाद के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मनुष्य और समाज के स्तर पर जरूरी तत्व हैं-

1-सत्य के प्रति आग्रह

2-अहिंसा

3-नैतिक और आध्यात्मिक बल

4-स्वावलंबन

5-ट्रस्टीशीप

6-स्वदेशी का पालन

महात्मा गाँधी का समाजवाद  एक वर्गहीन समाज का सपना है लेकिन उनका यह समाज वर्ग संघर्ष की जगह वर्ग सहयोग और समन्वय पर आधारित है। सत्य और अहिंसा इस समाज के मूल स्तंभ हैं।

गाँधी का स्वराज स्वतंत्रता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।उनके स्वराज का अर्थ केवल गुलामी से मुक्ति नही है बल्कि उस गुलामी से भी मुक्ति है जो हमारे मानस में हैं।अस्पृश्यता,जाति प्रथा और धार्मिक अंधविश्वास समाज की आवश्यक बुराइयां हैं।गाँधी मानते थे कि  समाज से इनको खत्म किए बिना असल स्वराज की प्राप्ति नही हो सकती और इस स्वराज की प्राप्ति समाज की आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी जरूरी है।यह स्वराज आत्मानुशासन और आत्मसंयम भी है जो केवल आत्मबल से प्राप्त किया जा सकता है।इसीलिए गाँधी का समाजवाद केवल समाजवाद नही है,यह जीवन-दर्शन है।

जवाहरलाल नेहरू

जवाहरलाल नेहरू  के समाजवाद की अवधारणा में लोकतंत्र का विचार केन्द्रीयता में है, यह भी कहा जा सकता है कि लोकतंत्र उनकी समाजवादी धारणा का प्रारम्भिक और अंतिम बिन्दु है।वस्तुतः लोकतंत्र एक ऐसा तथ्य है जो मार्क्सवादी समाजवाद से उनके समाजवाद की भिन्नता प्रकट करता है। नेहरू ने लोकतंत्र को एक गतिशील अवधारणा तथा नैतिक जीवन-दृष्टि के रूप में स्वीकारा है। उनकी लोकतंत्र की अवधारणा बहु-आयामी है, जो राजनीतिक लोकतंत्र से क्रमशः सामाजिक लोकतंत्र तथा आर्थिक लोकतंत्र की दिशा में विकसित होती है। नेहरू ने आर्थिक लोकतंत्र के विशिष्ठ रूप को लोकतांत्रिक समाजवाद कहा है।

नेहरू के लोकतंत्र की तरह ही उनके समाजवाद की धारणा भी गतिशील एवं व्यापक  है और वे इसे जीवन के नैतिक दृष्टिकोण के रूप में देखते हैं।

लोकतंत्र के बारे में नेहरू का यह कथन उनकी समाजवाद की अवधारणा के पूर्णतः निकट है, “यह अवसर की समानता को उस सीमा तक सब व्यक्तियों को प्रदान करता है, जिस सीमा तक  राजनीतिक व आर्थिक कार्यक्रमों में ऐसा करना संभव हो पाता है। यह व्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ सामर्थ्य और योग्यतानुसार उच्च विकास के विचार का संयोग करता है।” 

लोकतंत्र (राजनीतिक लोकतंत्र) तथा समाजवाद की घनिष्ठता को स्वीकारते हुए  नेहरू ने बताया है कि लोकतंत्र का वास्तविक विकास समाजवाद में ही होता है। 

1948 में कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन में  नेहरू ने कहा था, “लोकतंत्र का अपिहार्य परिणाम समाजवाद है। राजनीतिक लोकतंत्र में यदि आर्थिक लोकतंत्र सम्मिलित नहीं है तो वह अर्थहीन है।”

कार्ल मार्क्स- Karl Marx  (1818 – 1883AD) जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री औऱ राजनीतिक सिद्धांतकार

कार्ल मार्क्स को समाजवादी ज्ञान परंपरा में वैज्ञानिक समाजवाद का प्रणेता माना जाता है।उनका सिद्धान्त मार्क्सवाद के नाम से जाना जाता है।मार्क्सवाद एक सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक दर्शन है जो समाज पर पूंजीवाद के प्रभाव की व्याख्या करता है और साम्यवादी समाजवाद की वकालत करता है।

1848AD में मार्क्स और साथी जर्मन विचारक फ्रेडरिक एंगेल्स ने “द कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो” प्रकाशित किया,जिसमें पूंजीवाद व्यवस्था में निहित संघर्षों के स्वाभाविक परिणाम के रूप में वैज्ञानिक समाजवाद की अवधारणा को पेश किया गया है।मार्क्स ने ‘नेवे राइनिशे जीतुंग’ का संपादन प्रारंभ किया और उसके माध्यम से जर्मनी को समाजवादी क्रांति का संदेश देना आरंभ किया।लेकिन 1849 में अपने प्रखर लेखों के कारण उन्हें प्रशा से निष्कासित होना पड़ा।वह लंदन चले गए और जीवन पर्यंत वहीं रहे।

मार्क्स ने 1864 में लंदन में ‘अंतरराष्ट्रीय मजदूर संघ’ की स्थापना में भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मार्क्स द्वारा विकसित एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को ऐतिहासिक भौतिकवाद के नाम से जाना जाता है।यह सिद्धांत बताता है कि पूंजीवाद से पहले सामंतवाद प्रचलित उत्पादन हाथ से संचालित या पशु-संचालित साधनों से संबंधित प्रभुत्वशाली और किसान वर्गों के बीच सामाजिक संबंधों के एक विशिष्ट समूह के रूप में मौजूद था।अब औद्योगिक पूंजीवाद ने इसकी जगह ले ली है।

वे कहते हैं कि मानव समाज वर्ग संघर्ष के माध्यम से विकसित हुआ है।पूंजीवाद में यह शासक वर्गों (पूंजीपति) और उत्पादन के साधनों और श्रमिक वर्गों(सर्वहारा) के बीच के संघर्ष के रुप मे प्रकट होता है।पूँजीपति सर्वहारा को नियंत्रित करता है और सर्वहारा मजदूरी के बदले में अपनी श्रम शक्ति बेचकर पूंजीपति को सक्षम बनाता है।

“दार्शनिकों ने विभिन्न तरीकों से केवल दुनिया की व्याख्या की है,जरूरत इसे बदलने की है।”