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उच्च शिक्षा में आरक्षण:कुछ प्रश्न कुछ विचार
 
   इधर कुछ दिनों से यह बहस मीडिया और सोशल मीडिया में चर्चा के केंद्र में है कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए।निश्चित रूप से समीक्षा होनी चाहिए और इस पर किसी को कोई एतराज भी नही है लेकिन पहले समीक्षा इस बात की होनी चाहिए कि संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण अभी तक पूरा क्यों नही हुआ?समीक्षा इस बात की होनी चाहिए कि  पूरा न होने के पीछे कौन कौन से कारण रहें?समीक्षा इस बात की भी होनी चाहिए कि ओबीसी को जो आरक्षण आज से लगभग 30 साल पहले मिला वह आज तक ठीक से लागू क्यों नही हो पाया? जबकि वहीं आर्थिक रुप से कमजोर वर्ग के लोगों का आरक्षण एक साल से भी कम समय में लागू हो गया। जो लोग आरक्षण की समीक्षा की बात करते हैं वे इन सभी सवालों पर चुप हैं।
 
   यदि आंकड़ों के हवाले से देखा जाए तो देश की लगभग 60%ओबीसी आबादी में से देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ओबीसी प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर की संख्या एक प्रतिशत से भी कम है।ऐसा क्यों हैं?क्या इस देश की 70 करोड़ ओबीसी आबादी में एक प्रतिशत लोग भी प्रोफेसर या एसोसिएट प्रोफेसर के योग्य नही हैं?या इसके पीछे कोई साजिश है? 
यह देश का सबसे व्यवस्थित घोटाला है।संविधान द्वारा ओबीसी को 27% आरक्षण का प्रावधान है।उच्च शिक्षा के हवाले से देखें तो वर्तमान में देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 1100 से ज्यादा प्रोफेसर और 2600 से ज्यादा एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं औऱ इस हिसाब से ओबीसी के लगभग 300 प्रोफ़ेसर और लगभग 700 एसोसिएट प्रोफेसर होने चाहिए जो आज की तारीख में नही हैं।राज्य विश्वविद्यालयों की स्थिति भी किसी से छिपी नही है।अस्सिटेंट प्रोफेसर के स्तर पर भी अभी तक ओबीसी का प्रतिनिधित्व 14% के आसपास है।क्या समीक्षा करने वाले इस बात की समीक्षा करेंगे कि ऐसा क्यों है?
 
   एससी औऱ एसटी का प्रतिनिधित्व भी निराशाजनक है।देश के सभी केंद्रीय विश्विद्यालय में कुल 39 (एससी) औऱ 8 (एसटी) प्रोफेसर हैं।केन्द्र सरकार की किसी भी नौकरी में अभी तक संवैधानिक प्रतिनिधित्व पूर्ण नही हो पाया है।फिर बार बार यह समीक्षा का राग क्यों अलापा जाता है?
 
   समीक्षा के उत्सुक लोग यह तर्क देते हैं कि बार बार एक ही परिवार को आरक्षण नही मिलना चाहिए।जबकि वस्तुस्थिति यह है कि ओबीसी में क्रीमीलेयर लागू है तो उसमे कई पीढ़ियों का तो सवाल ही नही उठता और उन्हें अभी आरक्षण मिले कितने दिन हुए।अभी तो उनकी पहली पीढ़ी भी ठीक से आरक्षण का लाभ नही ले पाई।जहाँ तक रहा एससी और एसटी की बात तो कई पीढ़ियों से मिलने का प्रश्न तो तब होता है जब हमारे पास यह आंकड़े हों कि देश के कितने एससी और एसटी  परिवार ऐसे हैं जिनकी कई पीढ़ियाँ आरक्षण का लाभ ले चुकी।समीक्षा करने वालों के पास इसका कोई आंकड़ा नही है।जबकि दूसरी तरफ इस बात के पर्याप्त आंकड़े मौजूद हैं कि न्यायपालिका से लेकर विश्वविद्यालयों में एक ही परिवार की लगभग चौथी और पांचवीं पीढ़ी उस प्रोफेशन को कंटिन्यू कर रही है। वह न तो ओबीसी हैं न एससी और न एसटी।उसे मेरिट की संज्ञा दी जाती है लेकिन वह उस प्रोफेशन को इसलिए कंटीन्यू कर रही है क्योंकि वहाँ सबसे बडे पदों पर जाने के लिए कोई प्रतियोगी परीक्षा नही होती या उनके परिवार के लोग पहले से वहाँ है जो एक अनकहा आरक्षण सिस्टम चला रहे हैं।
 
 जब भी कॉलेजियम सिस्टम को हटाकर भारतीय न्यायिक सेवा आयोग और विश्वविद्यालयों में सीधी भर्ती के लिए कोई नियुक्ति आयोग बनाने की बात होती है तो कुछ लोग व्यवस्था में अपने होने का फायदा उठाकर इन प्रस्तावों का विरोध करने लगते हैं।ऐसा क्यों है?समीक्षा का प्रश्न तब आना चाहिए जब पहले सभी वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो जाए ,जो कि नही है।इसलिए ओबीसी,एससी और एसटी समाज को इस समीक्षा पर संदेह है और संदेह होना भी चाहिए क्योंकि आरक्षण कोई गरीबी हटाओ कार्यक्रम नही है।गरीबी हटाने के लिए सरकार की बहुत सी योजनाएं पहले से चल रही हैं जो सभी वर्गों के लिए है। आरक्षण इस देश की बहुसंख्यक आबादी का सभी क्षेत्रों में उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का माध्यम है।अभी तक उचित प्रतिनिधित्व नही हुआ और समीक्षा की बात होने लगी इसलिए इस पर संदेह होना चाहिए।दअरसल समीक्षा एक बहाना है आरक्षण खत्म करने का।संदेह इसलिए भी होना चाहिए क्योंकि समीक्षा के उत्सुक लोग यह कभी नही बताते कि यदि आरक्षण खत्म कर देंगे तो इस देश की बहुसंख्यक आबादी का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का उनके पास मॉडल क्या होगा?उसके बाद उनकी वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी जिससे ज्यादा से ज्यादा सामाजिक न्याय सुनिश्चित हो?आरक्षण खत्म करने की चाहत रखने वाले लोग जातिगत जनगणना पर चुप क्यों रहते हैं?आरक्षण खत्म करने की चाहत रखने वाले यह कभी नही बताते कि विश्वविद्यालयों में 50.5% का अघोषित आरक्षण वह क्यों ले रहे हैं?इन सभी सवालों का उत्तर दिए बिना समीक्षा की बात करना अतार्किक और दूषित मन का विचार लगता है।आरक्षण की समीक्षा करने वाले लोगों की इन सवालों पर एक सुविधाजनक चुप्पी है?वे कौन लोग हैं जो इन सवालों पर चुप  हैं।शायद चुप्पी इसलिए है क्योंकि वहाँ पर वह ओवर प्रिविलेज हैं और उन्हें अभी कई सालों तक कोई खतरा नही दिख रहा है।सरकार को इस दिशा में गंभीरता से सोचना चाहिए कि पहले उन क्षेत्रों की पहचान करे जहाँ ओबीसी,एससी और एसटी वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नही है और फिर उनके प्रतिनिधित्व की समुचित व्यवस्था करे।अधिक से अधिक डायवर्सिटी ही देश को अधिक लोकतांत्रिक और मजबूत बनाएगी ।साथ ही यह देश के दीर्घकालिक उद्देश्यों को पूरा करने में भी सहायक होगा।
 
अजय कुमार यादव (असिस्टेंट प्रोफेसर, सत्यवती महाविद्यालय,दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली)
डॉ.अजय कुमार यादव

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