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हिंदी दिवस                                                                      

आज हिन्दी दिवस है, आज 14 सितम्बर है। आज ही के दिन 71 साल पहले हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ था । इसके उपलक्ष्य में आज विभिन्नसंस्थानों चाहे सरकारी हों या निजी,हिन्दीमय रहेंगे । मीडिया में दिनभर हिन्दी बोलने,पढ़ने,सुनने, और हिंदी कवियों को बुलाकर कविता के कार्यक्रम किये जाएंगे। दिवस के दिन और अगले दिन अखबारों में हिंदी बोलने, पढ़ने,लिखने वालों का आकड़ा पेश किया जायेगा जिसमें हिंदी विश्व की भाषाओं की सूची में पहली या दूसरी रहेगी। कुछ दिनों तक यह हमारे बातचीत की भाषा की स्थिति में रहेगी हम हिन्दी में बोल लेंगे, बच्चों को हिन्दी सीखने की सीख दे देंगे और कुछ किताबें पढ़ लेंगे । बस हो गया।ऐसा नहीं है कि हिन्दी को लेकर ऐसी स्थिति कुछ दिनों में बनी है,बल्कि पिछले कई वर्षों तक अंग्रेजी को महिमामंडित करने और हिन्दी को कमतर साबित करने के अथकप्रयासों के बाद ही यह स्थिति आई है ।इसलिए हिन्दी साहित्य के प्रख्यात विद्वान और आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने अपने एक लेख में हिन्दी को लेकर अनोखा व्यंग्य किया था । वर्ष 2002 में हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी अखबार राष्ट्रीय सहारा के परिशिष्ट ‘हस्तक्षेप’ में लिखे एक लेख में डॉ. सिंह ने कहा था कि हिन्दी की स्थिति देखकर लगता है कि इसकी स्थिति ‘राष्ट्रपति’ जैसी है और अंग्रेजी को ‘प्रधानमंत्री’ की हैसियत प्राप्त है।

आज हिन्दी की स्थिति त्रिशंकु की है।स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उसे राष्ट्रभाषा बनाने की मांग हुई और स्वतंत्र  भारत की वह राजभाषा बना दी गई ।जैसे त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग जाने के लिए कहा गया था, लेकिन उसे अचानक बीच में इस तरह रोक दिया गया कि न वह स्वर्ग जा सका और न धरती पर वापस आ सकता था, वैसे ही हिन्दी को बना दिया गया ।वह न तो राजभाषा का दर्जा पाकर स्वर्ग जा सकती है और न ही गिरकर धरती पर आ सकती है।

हिन्दी का नाम लेते ही उसके दो रूप सामने आते हैं। एक, राजभाषा हिन्दी और दूसरी, वह हिन्दी जो बोलचाल या हमारे लोकप्रिय साहित्य में दिखती है ।अधिकांश विरोध राजभाषा को लेकर किया जाता है ।मजाक उड़ाते हुए उसे नकली हिन्दी या कठिन हिंदी की संज्ञा भी दी जाती है, चूंकि यह भाषा सरकार ने बनाई है और सरकारी सत्ता-प्रतिष्ठान पर अंग्रेजी वालों का दबदबा है, इसलिए राजभाषा के नाम पर जो भी लिखा जाता है ।वह अंग्रेजी का अनुवाद होता है । अनुवाद हमेशा मूलकी प्रतिछाया ही होता है और इसलिए वह हमेशा नकली ही रहेगा ।यहकहना गलत नहीं होगा कि सत्ता-प्रतिष्ठान पर काबिज अंग्रेजीपसंद अधिकारियों ने ही राजभाषा को नकली बना दिया ।  सरकार को चाहिए कि वह राजभाषा को अंग्रेजी के अनुवाद से मुक्ति दिलाए और विशेषज्ञों के माध्यम से शब्दों का चयन अपनी सभ्यता और संस्कृति के अनुरूप हो ।

हिन्दी के विरुद्ध दुष्प्रचार सबसे ज्यादा उन माध्यमों ने कियाजिन पर अंग्रेजी का वर्चस्व है । हिन्दी विरोध से इनका व्यावसायिक हित जुड़ा है । यह अनायास नहीं है कि आज विश्व के जिन देशों में सबसे ज्यादा अंग्रेजी के लेखक पैदा हुए हैं, उनमें भारत सबसे ऊपर है । सिर्फ साहित्य ही नहीं बल्कि समाज, राजनीति, अर्थ और ज्ञान-विज्ञान के अन्य विषयों पर दुनिया के सारे बड़े प्रकाशक भारतीय लेखकों की अंग्रेजी पुस्तकें छाप रहे हैं और भारत को इसका एक बड़ा बाजार बनाने के अभियान में जुटे हैं । ताज्जुब की बात है 1947 के पहले भारत में अंग्रेजी में लिखने वालों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती थी, लेकिन आज यह संख्या सैकड़ों पार कर चुकी है l मुल्कराज आनंद, राजाराव, आर.के. नारायण के बाद नाम तलाशना पड़ता था, लेकिन आज दर्जनों नाम ऐसे हैं जो अंग्रेजी के बड़े-बड़े पुरस्कार पा रहे हैं । पहले अंग्रेजी लिखने वाले भारतीय लेखकों के ज्यादातर प्रकाशक भारत के ही होते थे, लेकिन अब विदेशी प्रकाशकों की पैठ बढ़ गई है l चूंकि हिन्दी की लोकप्रियता को घटाए बगैर भारत में अंग्रेजी का बाजार नहीं बढ़ेगा, इसलिए देश का अंग्रेजीपसंद वर्ग हिन्दी का अप्रत्यक्ष रूप से विरोध करता रहा है ।

एक यह भी तर्क दिया जा रहा है कि ग्लोबलाइजेशन के युग में अब राष्ट्र-राज्य की अवधारणाएं लगभग खत्म हो गई हैं।  भारत राज्यों का संघ है l  वह कई क्षेत्रीय अस्मिताओं का पुंज भी  है चूंकि एक राष्ट्र की बात ही खत्म हो रही है और उसके टुकड़े ज्यादा महत्वपूर्ण हो रहे हैं, तो फिर एक भाषा की जरूरत क्यों? हिन्दी को क्यों राष्ट्रभाषा माना जाए? जरूरत एक संपर्क भाषा की है जो अंग्रेजी ही हो सकती है । चूंकि यह अंतरराष्ट्रीय संपर्क भाषा भी है, इसलिए इसे भारत की संपर्क भाषा बनाने से फायदा ही होगा । राष्ट्र-राज्य को समाप्त मानने वाली यह धारणा दुर्भाग्य से उन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष अंग्रेजीपसंद बौद्धिकों की है जिन्होंने दो दशक पहले सबॉल्टर्न स्टडीजके नाम से इतिहास लेखन के क्षेत्र में एक नए स्कूलकी स्थापना की थी । ये लोग अंग्रेजी में सोचते हैं और अंग्रेजी का ही खाते हैं । पश्चिम की नकल करते हैं और अपने समाज से कटकर वहीं के समाज में अपनी जड़ें तलाशते हैं।इस वर्ग ने एक दर्शन स्थापित किया है । यह दर्शन न सिर्फ अंग्रेजी के वर्चस्व और पश्चिमी विचारधारा की रक्षा करता है बल्कि परोक्ष रूप से नवउपनिवेशवाद का हिमायती भी है इसलिए हिन्दी का प्रश्न सिर्फ अपनी भाषा के प्रति मोह का नहीं है बल्कि एक नए किस्म के उपनिवेशवादी सोच के विरुद्ध लड़ने से भी है ।

कोई भाषा किसी दूसरी भाषा का विकल्प नहीं हो सकती और मातृभाषा का तो कोई विकल्प हो ही नहीं सकता । यह माना गया है कि मां के साथ परिवार में जो भाषा सीखी जाती है, उसकी जगह कोई दूसरी भाषा नहीं ले सकती। जो भी कोई दूसरी भाषा सीखेगा, वह अतिरिक्तहोगी, विकल्पनहीं ।  यह कहना गलत नहीं होगा कि जो अपनी बोली भूल जाता है वह कभी अच्छी हिन्दी न तो बोल पाता है और न लिख पाता है । इसलिए आज अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों को बोलियां सिखाने की जरूरत है, ताकि वे अच्छी हिन्दी सीख सकें । इस लिहाज से त्रिभाषाफॉर्मूला आज भी प्रासंगिक है, हर व्यक्ति को अपनी मातृभाषा के अलावा हिन्दी और अंग्रेजी का ज्ञान होना चाहिए।  शायद यही कारण रहा हो जिससे नई शिक्षा नीति-2020 में मातृभाषा में पढ़ने पर जोर दिया गया है ।

हिंदी माध्यम

अब मैं मूल समस्या पर आता हूं।  जब भी संघ लोक सेवा आयोग का अंतिम परिणाम जारी होता है तब हिंदी माध्यम के साथ नाइंसाफ़ी का रोना शुरू हो जाता है । हर जगह बहस होती है , लेख लिखे जाते हैं । कुछ दिनों बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है ।भारतीय प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए आपको 200 अंकों वाले सौ प्रश्नों के सामान्य अध्ययन के पेपर में सामान्यतया 100 अंक लाने ही होते हैं ।परीक्षा में कुल लगभग 5-6 लाख युवा आवेदक अपने सपने को लेकर बैठते हैं जिनमें से 10-12 हजार का चयन होना होता है । इन आंकड़ों से आप इस तथ्य का अनुमान तो लगा ही सकते हैं कि 0.01 अंक का भी कितना अधिक महत्व होता होगा ।

दूसरी बात यह कि परीक्षार्थी को 2 घंटे यानी 120 मिनट में 100 प्रश्न हल करने होते हैं । यदि उसका उत्तर गलत हुआ तो दंड के रूप में उसके 1/3  नंबर काट लिए जाते हैं यानी यहां उसके सामने चुनौती यह भी है कि वह प्रश्नों को जल्दी से समझे और सही-सही समझे, नहीं तो उत्तर गलत होने पर लेने की जगह देने पड़ जाएंगे । इस पृष्ठभूमि में आप हिंदी और अन्य भारतीय भाषा के माध्यम वाले परीक्षार्थियों की समस्या और उनके सामने प्रस्तुत उस भयावह संकट पर पूरी संवेदनशीलता के साथ विचार करें, तो जो  यह समस्या खड़ी है  उसे अनूदित हिंदी ने खड़ा कर दिया है ।

100 प्रश्नों में से प्रतिवर्ष औसतन आठ-दस प्रश्न ऐसे होते ही हैंजिसमेंनासमझ, कठिन एवं अव्यावहारिक हिंदी के अनूदित शब्द शामिल होते हैं । महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्हीं प्रश्नों को अंग्रेजी में आसानी से समझा जाता है । यदि आकड़ों को देखें तो ऐसी हिंदी के कारण परिणाम यह हो रहा है कि 2011 से पहले तक प्रारंभिक परीक्षा में हिंदी माध्यम से सफल होने वाले प्रतियोगियों का प्रतिशत जहां 40 से भी अधिक था, वहीं अब यह परिणाम 2013 तक गिरकर 11 प्रतिशत के आसपास आ गया, लेकिन 2014 में 2.1  प्रतिशत, 2015  में 4.8 प्रतिशत, 2016 में 3.4 प्रतिशत, 2017 में 4.5 प्रतिशत,2018 में 2.16 प्रतिशत, 2019 में 2 प्रतिशत यानी 15 सफल रहे । यानी पिछले लगभग पांच वर्षों से 5 प्रतिशत तक भी हिंदी माध्यम का  रिजल्ट नहीं आ सका है ।

स्वाभाविक है कि जब प्रारंभिक परीक्षा में ही हिंदी वाले बाहर हो गए हैं तो अंतिम चयन सूची में उनकी उपस्थिति केवल अनुमान और संभावना की बात हो जाएगीl कुछ बुद्धिजीवियों और नीति-निर्माता प्रशासकों द्वारा इसे हिंदी वालों की अयोग्यता और अक्षमता का प्रमाण घोषित कर दिया जाता है।
यह भाषाई अन्याय केवल हिंदी वालों के साथ ही नहीं, बल्कि उन सभी भारतीय भाषाओं के युवाओं के साथ भी हो रहा है, जो स्वयं को माध्यम के रूप में अंग्रेजी लेने की स्थिति में नहीं पाते। सिविल सेवा परीक्षा के प्रश्न पत्र केवल दो ही भाषाओं में छपते हैं-अंग्रेजी और हिंदी में।स्पष्ट है कि प्रश्नों को समझने के लिए गैर हिंदीभाषी भी हिंदी भाषा का ही सहारा लेते हैं ।  यदि उन्हें अंग्रेजी आ रही होती तो वे उसे ही अपना माध्यम बना लेते । स्पष्ट  है कि बड़ी चतुराई से उन्हें भी प्रारंभिक स्तर पर ही बाहर कर दिया जा रहा है । जहां तक मुख्य परीक्षा की हिंदी का प्रश्न है, उसमें स्थिति उतनी बुरी नहीं है, फिर भी ऐसे कई शब्दों की भरमार देखने को मिलती है, जिनसे हिंदीभाषियों को समझने में कठिनाई होती है ।

आज आम भारतीय जनमानस ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ शब्द से परिचित हो चुका है, लेकिन सिविल सेवा का प्रश्नपत्र  इसे ‘शल्यक प्रहार’ लिखता है । अंकीयकृत प्रजनक, विधीयन, प्रोत्कर्ष, प्रमात्रा, प्रवसन जैसे अनेक ऐसे शब्दों को चुन-चुनकर लाया जाता है, जो समझ से परे हों । इन शब्दों को देखकर ही प्रतियोगी भयभीत हो जाएगा । चिंता तब और बढ़ जाती है जब भारत की सबसे बड़ी बोर्ड परीक्षा यू.पी बोर्ड में हिंदी के विषय में 8 लाख बच्चे फेल हो जाते हैं l एक हिंदीभाषी प्रदेश में लाखों की संख्या में बच्चों का फेल होना विशेषज्ञों को भी सोचने पर मजबूर कर रहा है ।  विशेषज्ञों के मुताबिक, यूपी बोर्ड में हाईस्कूल और इंटरमीडिएट का हिंदी पाठ्यक्रम अन्य बोर्डों की तुलना में काफी जटिल है। उनका कहना है कि पाठ्यक्रम  में अवधी और ब्रज भाषाओं के कवि, लेखक और उनकी कृतियां शामिल हैं । ये भाषाएं प्रचलन में तो हैं लेकिन नई पीढ़ी से धीरे-धीरे दूर हो रही  हैं । सैकड़ों सालों पुरानी इन भाषाओं को पढ़ाने के लिए विशेषज्ञों की आवश्यकता है l साथ ही कॉलेजों में हिंदी के शिक्षकों की भारी कमी भी है।  वैसे भी हिंदी जैसे विषय को तो दूसरे विषय के अध्यापक भी पढ़ा लेते हैं,  इसी धारणा ने हिंदी की ऐसी दुर्गति की है ।

हद तो तब हो गयी जबकुछ महीने पहले  हिंदी पट्टी के विश्वप्रसिद्ध और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के साक्षात्कार में वहाँ के कुलपति द्वारा हिंदी माध्यम के आवेदकों को जलील किया गया । उन्हें अपना उत्तर अंग्रेजी भाषा में देने को कहा गया । ऐसा न करने पर खानापूर्ति करके, उनका साक्षात्कार पूरा करके,उन्हें चयन सूची से बाहर कर दिया गया ।बाद में जिसका विरोध आवेदकों ने मिडिया और अन्य माध्यमों से किया । जबकि हमारा संविधान हमें अभिव्यक्ति के माध्यम को चुनने के लिए स्वतंत्र रखा है ।

हिंदी विभाग

अब आते हैं हिंदी विभागों में , हिंदी दिवस आते ही विभागों में तैयारियां शरू हो जाती हैं । पखवाड़ा भी मनाया जाता है । हिंदी के प्राध्यापको द्वारा इसके महत्त्व को बतलाया जाता है । निबंध प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं । कुछ विद्वान् आलोचक हिंदी दिवस मनाने के पक्ष में और कुछ विपक्ष में होते हैं । कुछ प्रोफेसर अपने संबोधन में कहेंगे कि हिंदी को जो सम्मान मिलना चाहिए था । वह नहीं मिला । अगले दिन अखबारों में कुछ प्राध्यापकों के हिंदी दिवस सम्बन्धी विचार भी प्रकाशित हो जायेंगे । हिंदी में काम करने वाले कर्मचारियों को सम्मानितकरके पखवाड़ा समाप्त किया जायेगा । 14 सितम्बर के बाद हिंदी के प्रोफेसर अपने अंग्रेजी माध्यम के बच्चों की सीबीएसई बोर्ड के 10 वीं-12 वीं के ग्रेड-कार्ड को सोशल मीडिया पर शेयर करेंगे और बधाइयां पायेंगे ।

हरिशंकर परसाई ने अपने एक निबंध में लिखा है -साधो, एक भाई ने बताया- मेरे पड़ोस में एक रिटायर्ड शिक्षक रहते हैं । 5 सितम्बर को मैंने देखा, वे एक हाथ में माला और दूसरे में नारियल लिए चले आ रहे हैं । कपाल पर लाल तिलक भी है । वे मजे के विनोदी स्वभाव के बुजुर्ग हैं । मैंने पूछा-कहां से आ रहे हैं पंडितजी? उन्होंने कहा-आज नागपंचमी है न? कुश्ती जीतकर आ रहे हैं।  मैंने कहा- नागपंचमी तो पिछले महीने हो गई, पंडितजी आज तो पांच सितम्बर है, ‘शिक्षक दिवस’ ,पंडितजी हंसकर बोले- वही शिक्षक कुश्ती जीतकर आ रहा हूं ।  रोटरी क्लब में सम्मान कराके आ रहा हूं ।  देखो, साल-भर सांप दिखे तो उसे भगाते हैं । मारते हैं । मगर नागपंचमी को सांप की तलाश होती है, दूध पिलाने और पूजा करने के लिए । सांप की तरह ही शिक्षक दिवस पर रिटायर्ड शिक्षक की तलाश होती है, सम्मान करने के लिए । परसाई जी ने भले ही यह बात शिक्षक दिवस पर कही हो लेकिन यह हिंदी दिवस के लिए भी उतनी ही सटीक लगती है।

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