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लोकनायक और जेपी के नाम से प्रसिद्ध जय प्रकाश नारायण महान स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और राजनेता थे l जय प्रकाश नारायण का आधुनिक भारत के इतिहास में अनोखा स्थान है । वह देश के ऐसे अकेले व्यक्ति हैं जिन्हें तीन आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लेने का सौभाग्य प्राप्त है । जीवन को जोखिम में डालते हुए अंग्रेजों के खिलाफ उन्होंने लड़ाई लड़ी । पचास और साठ के दशक में भूदान आंदोलन में भाग लेकर उन्होंने लोगों की सोच बदलने की कोशिश की और बड़े पैमाने पर परिवर्तन लाने का काम किया । सत्तर के दशक में भ्रष्टाचार और अधिनायकवाद के खिलाफ उन्होंने आंदोलन का नेतृत्व किया।
 
जय प्रकाश नारायण इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियों के खिलाफ थे और गिरते स्वास्थ्य के बावजूद 1977 में विपक्ष को एकजुट कर इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल कर दिया l संपूर्ण क्रांति का उनका दर्शन और आंदोलन भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव तो लाया ही साथ ही देश के सामाजिक ताने-बाने को बदलने में भी बेहद कारगर साबित हुआ । आजादी के बाद वे बड़े-बड़े पद हासिल कर सकते थे लेकिन उन्होंने गांधीवादी आदर्शों की अपनी सोच नहीं छोड़ी और सादा जीवन जीकर बेमिसाल हो गए। आज लोकनायक जय प्रकाश की विचारधारा संघर्ष और प्रासंगिकता पर विचार करने की आवश्यकता है।
 
बिहार के एक छोटे से गांव सिताब दियारा (सारण) में जन्मे जय प्रकाश नारायण के लोक नायक बनने की कहानी बड़ी दिलचस्प है। जीवनभर समाजवादी विचारधारा के जरिए समाज में बदलाव का काम करने वाले जय प्रकाश ने उम्र के इस पड़ाव में भारतीय राजनीति में वापसी की जब देश के युवा परिवर्तन के राह पर बिना नेतृत्व के ही चल पड़े थे । जय प्रकाश राजनीति से संन्यास ले चुके थे लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए उन्होंने वापसी की और संपूर्ण क्रांति के नारे के साथ संघर्ष के मैदान में कूद पड़े । स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर स्वतंत्र भारत की राजनीति में जिन नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई उनमें लोकनायक जय प्रकाश का नाम प्रमुख है l जय प्रकाश का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को सिताब दियारा गांव जो कि वर्तमान में बिहार के सारण जिले के अंतर्गत आता है । उनके पिता का नाम हरसुदयाल और माता का नाम फूल रानी देवी था । नौ साल की उम्र में पटना का कॉलेज में प्रवेश किया। 1920 में उनका विवाह प्रभावती देवी से हुआ। मौलाना अबुल कलाम आजाद के भाषण से प्रभावित होकर उन्होंने पटना कॉलेज छोड़कर बिहार विद्यापीठ में प्रवेश लिया ।1922 में वे कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में पढ़ने चले गए l वहां करीब सात साल रहे । अमेरिका से बीए और एमए की डिग्री प्राप्त की । दुर्भाग्य से पीएचडी की पढ़ाई पूरी न कर सके । भारत वापस लौटे तो उनके विचार एवं दृष्टिकोण में कार्ल मार्क्स प्रभाव था हालांकि उन्होंने भारतीय कम्युनिस्टों का समर्थन कभी नहीं किया।
 
स्वाधीनता आंदोलन
 
जवाहरलाल नेहरू के आमंत्रण पर 1929 में वे कांग्रेस में शामिल हुए l इसके बाद उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई । ब्रिटिश शासन के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने पर 1932 में उन्हें जेल में बंद कर दिया गया । इसी समय में राममनोहर लोहिया, अशोक मेहता, मीनू मसानी, अच्युत पटवर्धन जैसे समाजवादी  नेताओं के साथ घनिष्ठ संपर्क हुआ । फलस्वरूप उन्हें कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में शामिल होने की प्रेरणा मिली ।1939 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव के रूप में उन्होंने लोगों से आवाह्न किया कि दूसरे विश्वयुद्ध का फायदा उठाते हुए भारत में ब्रिटिश शोषण को रोका जाए तथा इस सरकार को उखाड़ फेंका जाए । जिसके कारण उन्हें नौ  महीने के लिए जेल में डाल दिया गया । रिहाई के बाद उन्होंने महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस से मुलाकात की l स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत करने के लिए उन्होंने दोनों नेताओं के बीच बेहतरी लाने की कोशिश की लेकिन वे उस में सफल नहीं हो सके ।

भारत छोड़ो आंदोलन
 
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जय प्रकाश का नेतृत्व गुण उभर कर सामने आया । जब महात्मा गांधी समेत कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था तब उन्होंने राम मनोहर लोहिया और अरुणा आसिफ अली के साथ मिलकर आंदोलन को संभाला l बाद में उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया । उन्होंने  हजारीबाग जेल से भागने की कोशिश भी की जिसमें वे सफल भी हो गए और अपने  छह साथियों के साथ जेल से फरार हुए । इसके बाद जय प्रकाश ने भूमिगत होकर सक्रिय रूप से काम किया l इसी वक्त नेपाल में ‘आजाद दस्ता’ नामक संगठन बनाया । जब गांधी ने जोर देकर कहा कि वे सिर्फ राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश की बिना शर्त रिहाई के बाद ब्रिटिश शासकों के साथ बातचीत करेंगे तब उन्हें 1946 में रिहा कर दिया गया ।
 
आजादी के बाद
 
आजादी के बाद जय प्रकाश को अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार सामाजिक परिवर्तन के लिए हिंसा की निरर्थकता का पूर्ण विश्वास हुआ था । गरीबों के लिए उनकी प्रतिबद्धता कम नहीं हुई l यही उन्हें विनोवा भावे के भूदान आंदोलन के करीब लाया। यह उनके जीवन का दूसरा महत्वपूर्ण चरण था । सत्तर के दशक की शुरुआत में तीसरा चरण जब आम-आदमी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई की विकृतियों से पीड़ित था। 1974 में गुजरात के छात्रों ने उनसे नवनिर्माण आंदोलन  के नेतृत्व का आग्रह किया l उसी वर्ष जून में उन्होंने पटना के प्रसिद्ध गांधी मैदान में शांतिपूर्ण सभा की जिसमें संपूर्ण क्रांति का आवाहन किया l उन्होंने छात्रों से भ्रष्टाचार और राजनीतिक संस्थाओं के खिलाफ खड़े होने की अपील की । एक साल के लिए महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों को बंद करने की अपील की l वे चाहते थे कि छात्र अपने को राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए समर्पित करें l इस आंदोलन के अंत में आपातकाल की घोषणा हुई जो बाद में जनता पार्टी की जीत में बदल गई । भारत में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी थी। संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान ही जय प्रकाश का स्वास्थ्य बिगड़ना शुरू हो गया था । जांच के बाद पता चला कि उनकी एक किडनी खराब हो गई थी । आजादी की लड़ाई से लेकर देश के अनेक आंदोलनों की मशाल थामने वाले जय प्रकाश ने अपने विचारों, दर्शन और व्यक्तित्व से देश को नई दिशा दिखाई । भारत में समाजवादी पार्टी के स्थापना के साथ ही भारत छोड़ो आंदोलन और अराजकता के खिलाफ आंदोलन और संपूर्ण क्रांति के वाहक बने । देश में एक नई क्रांति का एक नई ऊर्जा का आगाज किया । सर्वोदय और भू-दान आंदोलन की सीमित सफलता से दुखी जय प्रकाश नारायण लोकतंत्र को दोष मुक्त बनाना चाहते थे l  वो धनबल और चुनाव के बढ़ते खर्च को कम करना चाहते थे ताकि जनता का भला हो सके l  साथ ही जय प्रकाश का सपना एक ऐसा समाज बनाने का था जिसमें नर-नारी के बीच समानता हो और जाति का भेदभाव न हो l
 
संपूर्ण क्रांति
 
जात-पात छोड़ दो छोड़ दो ।
समाज के प्रवाह को नई दिशा में मोड़ दो ।
5 जून 1974 को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में जय प्रकाश संपूर्ण क्रांति का आवाहन किया था तो मैदान में यही नारा गूंज रहा था l उस समय लगभग पांच लाख लोग इसके गवाह बने थे। इसकी गूंज दूर तक गई थी। इसका प्रभाव इतना था कि केंद्र में कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ा l जय प्रकाश की हुंकार पर नौजवानों का जत्था सड़कों पर निकल पड़ा । जय प्रकाश घर-घर में क्रांति के पर्याय बन गए l  दरअसल, संपूर्ण क्रांति जय प्रकाश का विचार और नारा था । जय प्रकाश ने कहा था – संपूर्ण क्रांति से मेरा तात्पर्य समाज के सबसे अधिक दबे-कुचले व्यक्ति को सत्ता के शिखर पर देखना है। 1973 में उन्होंने यूथ फ़ॉर डेमोक्रेसी नामक संगठन बनाया था। उन्होंने युवाओं से अपील किया कि वे लोकतंत्र को बचाने के लिए आगे आयें । क्रांति शब्द नया नहीं था परंतु संपूर्ण क्रांति एक नई पहल थी। जय प्रकाश ने कहा था – यह क्रांति है मित्रों ! और संपूर्ण क्रांति है । विधानसभा का विघटन मात्र इसका उद्देश्य नहीं है । यह तो महज मील का पत्थर है । हमारी मंजिल बहुत दूर है और हमें अभी बहुत दूर तक जाना है । उन्होंने घोषणा की – भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रांति लाना, ऐसी चीजें हैं जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकती क्योंकि वे व्यवस्था की ही उपज हैं । वे तभी पूरी हो सकती हैं जब संपूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए क्रांति और संपूर्ण क्रांति आवश्यक है। उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति के सात सोपानों की चर्चा की- पहला-राजनीतिक, दूसरा-आर्थिक , तीसरा-सामाजिक, चौथा-सांस्कृतिक, पांचवा-बौद्धिक, छठा-शैक्षणिक और सातवां-आध्यात्मिक । संपूर्ण क्रांति को जनता का भारी समर्थन मिल रहा था l जय प्रकाश अब लोकनायक बन चुके थे ।
 
प्रासंगिकता
 
जय प्रकाश के संपूर्ण क्रांति के आंदोलन में सामाजिक न्याय और जातिविहीन समाज की परिकल्पना की गई थी l इस आंदोलन के कारण उस समय युवाओं ने अपने नाम में सरनेम लगाना छोड़ दिया था l  हालांकि, यह सब बहुत दिनों तक नहीं चल सका और भारतीय राजनीति में जाति के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं और राजनीतिक दलों की बहुतायत हो गई l इसके बाद ही देश में लालू, मुलायम, नीतीश और रामविलास पासवान जैसे नेता उभरकर आए l जय प्रकाश आंदोलन के बाद देश में लोकतांत्रिक अधिकारों की नागरिक चेतना का विकास हुआ l युवा आंदोलन धीरे-धीरे पर्यावरण, नर-नारी समता, जाति प्रसंग और सांप्रदायिक सद्भाव की ओर बढ़ा l आज देश में काम कर रहे कई हज़ार जनसंगठन के पीछे, देश में 1974 से 1979 के बीच जय प्रकाश की मेहनत और प्रेरणा है l लोकनायक जय प्रकाश के विचार और दृष्टिकोण आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। आजादी और लोकतंत्र की स्थापना के बाद महात्मा गांधी की परंपरा को आगे ले जाने में जिन नेताओं की भूमिका को सबसे ज्यादा याद किया जाता है उनमें जय प्रकाश नारायण सबसे महत्वपूर्ण है। आजादी के बाद हुए पहले आम-चुनाव से ही जय प्रकाश ये मानने लगे थे कि राज्य सत्ता जिस रूप में हो, वह कल्याणकारी नहीं हो सकती उसमें जनता के प्रतिभागिता  का प्रभाव नहीं हो पाता है । अपने इन्हीं विचारों का अनुसरण करते हुए उन्होंने देखा कि राज्य सत्ता आक्रामक तानाशाह के रूप में काम करने लगी है जिसमें लोकतंत्र केवल वोट भर रह गया है तो वे उठ खड़े हुए तथा उसे उखाड़ फेंकने में भी सफल रहे । लगातार अस्वस्थ रहने के कारण  8 अक्टूबर 1979 को पटना में जय प्रकाश का निधन हो गया और उन्हें लोक सेवा के लिए पुरस्कार के लिए चुना गया था वहीं  1999 में सर्वोच्च भारत रत्न का सम्मान दिया गया।
जय प्रकाश के नाम पर देश में बहुत सारे शिक्षण संस्थान हैं जिसमें 1990 में तीन जिलों- छपरा, सीवान और गोपालगंज के लिए जय प्रकाश विश्वविद्यालय की स्थापना हुयी। दुर्भाग्य है कि 30 वर्षों के बाद भी यह विश्वविद्यालय शिक्षा के मानचित्र पर कहीं भी नजर नहीं आता l भारत सरकार के  शिक्षा मंत्रालय की एनआईआरएफ की रैंकिंग में भी इसे अभी तक स्थान बनाने की दरकार है ।

डॉ. रजनीश कुमार यादव की उच्च शिक्षा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली से हुई है।वर्तमान में जे .पी. यूनिवर्सिटी छपरा बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।
 

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