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रीतिकालीन साहित्य इतिहासलेखन और मुगल बादशाहों की कविताएं-रामानुज यादव

इतिहास अतीत का वर्तमान में किया गया अध्ययन है | इसी तरह से ‘साहित्य का इतिहास’ साहित्य के अतीत के रूप का अध्ययन और विश्लेषण | इतिहासकार अपने इतिहास लेखन में किसे किस रूप में शामिल और व्याख्यायित करता है, किसे छोड़ता है ; यह उसकी अपनी एक ‘दृष्टि’ से निर्मित होती है | उसकी इस दृष्टि का निर्माण विचारधारा, समाज, धर्म, शिक्षा जैसे तमाम तथ्यों से गुजरकर होती है | वह साहित्य के इतिहास को अपने विवेचन विश्लेषण के लिए वर्गो उप-वर्गों में भी बांटता है । इस लेख में मेरे विवेचन का विषय इतिहास के पन्नों का वह पूरा दौर है जिसमें मुगल वंश के स्थापत्य का स्वर्ण काल कहा जाता है | यानी कि शाहजहां का काल |यह इस दौर से आरंभ होकर पुर्तगाली, डच, डेनिस, फ्रासीसी, अंग्रेजों जैसी व्यापारिक शक्तियों के भारत आने तथा उत्तरोत्तर भारत के गुलाम होते जाने का दौर है | मुगल वंश क्रमशः धूल धूसरित  हो रहा है तो दूसरी ओर इस काल के  एकदम अंतिम दौर में भारत का ‘प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ भी लड़ा जा रहा होता है | साहित्य का इतिहास लेखन सामान्यतः इसे ‘रीतिकाल’ के नाम से जानता पहचानता है | इसकी समय सीमा को मोटे तौर पर सन 1643 से 1857 तक देखा जाता है | सवाल यहां यह है कि यह नाम, वर्गीकरण, समय सीमा कहां से आई | इन बातों की पड़ताल करने के लिए हमें इतिहास में जाना होगा जहां से इसका  विचार बिंदु आरंभ होता है |

 अंग्रेजों के भारत में अपनी जड़े सुनिश्चित कर लेने के उपरांत अपनी सत्ता को निरंतर स्थायित्व देते रहने के निमित्त उन्हें यहां की सभ्यता ,संस्कृति,  रीति-रिवाज इन सब को जानने की आवश्यकता महसूस हुई | यहां की भाषा को समझने तथा समझाने के लिए दुभाषिये की पौध तैयार की गई | फोर्ट विलियम कॉलेज इसी दुभाषिये की पौध तैयार करने का स्थान था | इसी क्रम में साहित्य को भी समझने का उद्यम किया जाने लगा |

हमारी भारतीय परंपरा में इतिहास लेखन की ‘पाश्चात्य अवधारणा’ के अनुसार इतिहास लेखन नहीं मिलता था तो इन लोगों ने कवियों रचनाओं को संकलित करने और करवाने तथा समझने का भी प्रयत्न किया । इसमें व्यैक्तिक और सांस्थानिक स्तर दोनों पर प्रयास किया गया । 1839 में “फ्रेंच भाषा मे इस्तवार द ला लितरेत्युर एनदुई ए हिंदुस्तानी’ (हिन्दुई और हिंदुस्तानी साहित्य का इतिहास) का अपना विशेष स्थान है । क्योंकि हिंदी साहित्य के दीर्घकालीन गाथा को सूत्रबद्ध रूप में स्पष्ट करने का यह सर्वप्रथम प्रयास था |”  इसमें  गार्सा द तासी ने  केवल कवियों का ‘विवरण’ भर दिया है  | उस समय तक उपलब्ध ज्ञान को इसमें  हिंदी उर्दू के 738 कवियों के रूप में संकलित कर दिया गया है | ना तो काल विभाजन का प्रयास है न आलोचनात्मक विवरण का | परवर्ती इतिहासकारों ने ग्रियर्सन के अलावा बहुत सारे लोग इससे फायदा नहीं उठा सके क्योंकि यह मूल रूप में फ्रेंच भाषा में था |

मौलवी करीमुद्दीन का ‘तजकिरा इ शुअराई’ तथा महेश दत्त शुक्ल जी का ‘भाषा काव्य संग्रह’ इसी प्रकार के साहित्य इतिहास लेखन के आरंभिक प्रयासों के रूप में गिने जाएंगे | इनमें भी कोई वास्तव में इतिहास न हो कर संकलन मात्र है | इतिहास लेखन की अपनी एक प्रविधि होती है | इसी के अनंतर सन् 1883 में शिव सिंह सेंगर का ‘शिवसिंह सरोज’ सामने आता है |  इसमें 998 कवियों का विवरण है | इसमें भी  इतिहास का  अभाव है | सन् 1888 में डॉक्टर सर जॉर्ज ग्रियर्सन का ग्रंथ ‘द मोर्डेन वर्नाकूलर  लिटरेचर आफ हिंदुस्तान’ हमारे सामने आता है | दरअसल यह सारा विवरण इसलिए है ताकि रीतिकालीन काव्य और हिंदी आलोचना की ऐतिहासिक परंपरा को समझा जा सके | बिना इस पूरी परंपरा को समझे रीतिकालीन हिंदी साहित्य इतिहास आलोचना को समझना कठिन है | यह ग्रंथ हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास है जिसमें “पहली बार कवियों का विवरण कालक्रमानुसार दिया गया है |”  काल विभाग, कालों की सामान्य प्रवृत्तियां, कवियों पर विस्तारपूर्वक लिखना तथा हर कवि को एक एक अंक देकर नियत स्थान पर रखना ये कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो इसकी वैज्ञानिकता तथा इतिहास लेखन की उपादेयता को सिद्ध करती हैं | इन्होंने “जायसी और तुलसी पर अलग से अध्याय भी लिखा है| संभवतः इन्ही  अध्यायों ने  आचार्य शुक्ल जी का विशेष ध्यान इन कवियों की ओर आकृष्ट किया होगा |”  जिसे  आचार्य  रामचंद्र शुक्ल जी ने अपने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में रीतिकाल कहा है उसकी भी प्रेरणा उन्हें इसी से मिली है |

 ग्रियर्सन ने अपने इतिहास ग्रंथ के अध्याय 7 को  ‘रीतिकाव्य’ नाम दिया है और इसमें उन्होंने केशवदास, चिंतामणि त्रिपाठी, और बिहारी लाल को मुख्य कवि तथा इस काल को “काव्य प्रतिभा की एक असाधारण श्रेणी प्रस्तुत”  करने वाले कवियों  के रूप में देखते हैं | व्यापक रूप से देखें तो अध्याय 5 मुगल दरबार, अध्याय 8 तुलसीदास के अन्य परवर्ती कवि, अध्याय 9 अट्ठारहवीं शताब्दी का काल, अध्याय 10 कंपनी के  शासन में हिंदुस्तान, रीतिकालीन काव्य के ही हिस्से हैं | हालांकि 10 वें अध्याय में रीतिकाल और आधुनिक काल दोनों का घालमेल कर बैठे हैं | फिर भी  प्रथम इतिहास ग्रंथ के रूप में प्रसिद्ध इस किताब में रीतिकालीन हिंदी आलोचना को लेकर पूर्वाग्रह नजर नहीं आता है बल्कि बिहारी, केशवदास के साथ ही साथ सुंदरकुंवरि बाई, रतनकुंवरि बाई तथा अन्य  स्त्री कवियित्रियों को पर्याप्त महत्व देकर नोटिस भी किया गया है | परवर्ती आलोचना बहुत सारे बिंदुओं को यहां से छोड़ना शुरू कर देती है | कहते हैं कि आलोचना निरंतर विकसित होती रहती है| ग्रियर्सन ने ‘सरोज’ को आधार माना था तकरीबन 94% कवि इन्होंने वहीं से उठाया है | शुक्ल जी ने ‘सरोज’; ‘मिश्र बंधु’ और ग्रियर्सन तीनों की ही नीव पर अपना इतिहास लेखन खड़ा किया है |

इस संबंध में सबसे महत्वपूर्ण और गंभीर प्रयास के रूप में सन 1929 में आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी द्वारा रचित ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ हमारे सामने आता है | शुक्ल जी ने अपने मध्यकाल को दो भागों में विभाजित किया है  जिसमे उत्तर मध्यकाल को रीतिकाल की संज्ञा दी गई है | इसके 3 प्रकरण इन्होंने किए हैं | प्रकरण 1 जिसमें इस काल का सामान्य परिचय दिया गया है | प्रकरण 2  रीति ग्रंथकार कवि के रूप में नाम निर्दिष्ट किया गया है | इस काल  का प्रकरण 3  जिसे शुक्ल जी ने रीतिकाल के अन्य कवि नाम दिया है |

 इस पूरे दौर के लगभग 200 वर्ष की कविता में श्रृंगार का तत्व प्रधान रूप से उपस्थित है ऐसा प्रायः सभी आलोचकों का मत है | यहां पर कविता करने की एक निर्दिष्ट ‘रीति’ है | पहले कवि कुछ लक्षण देता है फिर उदाहरण स्वरुप अपनी कविता लिखता है |‘रीति’ की यह ‘परंपरा’ या ‘शैली’ इस दौर में इतनी प्रभावी रही कि इस काल को समझने के लिए जो भी उप विभाजन किए गए उसने भी ‘रीति’ को ही मुख्य तत्व के रूप में देखा गया | हुआ क्या कि वर्गीकरण की इस कठिनता सरलता ने  कहीं न कहीं कवियों के स्वतंत्र मूल्यांकन विवेचन को भी प्रभावित किया है | कौन कवि किस वर्ग  में है या नहीं है इस पर काफी लंबी खींचतान भी हुई है |

शुक्ल जी के बाद विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसे ‘श्रृंगार काल’ नाम दिया तथा दो मुख्य भागों में बांटा | रीतिबद्ध  और  रीतिमुक्त ; फिर इन दोनों विभागों के 2 – 2 उपभाग की है यथा-लक्षणबद्ध, तथा लक्ष्यमात्र काव्य ,रहस्योंमुख काव्य और  प्रेम काव्य के रूप में बांटा |  इसी तरीके से बच्चन सिंह ने भी ‘हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास’ में इसे बद्धरीति तथा मुक्तरीति दो मुख्य वर्गों में बांटा है | इसके बाद इन दो मुख्य वर्गों के भी दो दो उपवर्ग कर डाले हैं | लब्बोलुआब है कि सीधा साधा अगर इसे रीतिबद्ध, रीतिमुक्त रीतिसिद्ध में देखा जाए तो कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए क्योंकि रीतिमुक्त  और मुक्तरीति दोनों में रीतिमुक्त अभियान ज्यादा प्रचलित है तो इसे अपना लेने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए | रीतिमुक्त काव्य के अंतर्गत हमें कवियों के कई वर्ग उपवर्ग  मिलते हैं | मतलब बहुत स्पष्ट है कि जो ‘रीति’ से बध कर नहीं बल्कि स्वच्छंद भावों के आधार पर रचना कर रहा है वह रीतिमुक्त कवि है | जो ‘रीति’ परंपरा से प्रभावित है लेकिन उससे अलग कुछ भक्ति, श्रृंगार प्रेम, या सूक्तियों  की रचना कर रहा है तो वह भी रीतिमुक्त है | हम चाहे तो  रीतिमुक्त काव्य की चौहद्दी को इस दृष्टि से देख कर काफी विस्तृत कर सकते हैं और यह सही दृष्टि भी होगी | जिससे रीतिकाल के उन अधूरे पक्षों को सामने लाने में भी सहायता मिल सकती है जो आज तक हिंदी आलोचना के हिस्से से अनदेखा सा रह गया है | इसी दृष्टि से देखने पर हमें मुग़ल बादशाहों की कविताओं के विश्लेषण में आसानी रहती है ।

जो रीतिकाल की समय सीमा है वह मुगल दरबार या मुगल वंश की समय सीमा से भी संबंधित है | सोचने वाला सवाल यह भी है की उस समय में मुगल दरबार में हिंदी की कविताएं भी की जाती रही होंगी  | मुग़ल बादशाहों , उच्च पदाधिकारियों ,रानियों द्वारा भी लेखन किया जाता रहा होगा ? ऐसा तो है नहीं की रानियां दिन रात हरम में सजने संवरने में व्यस्त रहती होंगी ? उन्होंने भी कुछ लेखन किया है ऐसा हमें स्रोतों से पता चलता है | हालाँकि ऐसी कवितायेँ मात्र मे कम है | मुगल बादशाहो ने भी हिंदी में कविताएं लिखी हैं और वह आज हमें उपलब्ध भी हैं | लेकिन इन सबसे पहले हमें कुछ बातों को जान सुन और समझ लेना होगा |

पहली बात की क्या कारण था की आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने ‘हिंदी साहित्य के इतिहास’ में इन मुग़ल बादशाहों की रचनाओं को कोई स्थान नहीं दिया और ना ही उनका जिक्र किया | दरअसल 1920 30 के दौर में राष्ट्रवाद वाला मसला काफी हावी था । एम एस गोलवलकर ने लिखा है कि हमारी हिंदु राष्ट्र की धारणा मात्र राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों का पुलिंदा नहीं है यह मूलतः सांस्कृतिक है ।(बंच ऑफ थॉट पेज 22 )इस सांस्कृतिक निर्माण की एक प्रतिक्रिया हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन भी रहा है इसलिए मुग़ल राजाओं की कविताएं इतिहास से बाहर है ।

दूसरी बात इन मुग़ल बादशाहों की रचनाओं की विषय वस्तु क्या है और वह कौन से समाज को दिखाती हैं | तीसरी बात जैसा कि अक्सर हिंदी आलोचना या सामान्य जनमानस में मुग़ल बादशाहों को हिंदी विरोधी या ब्रज भाषा के विरोधी के रूप में देखा जाता है | क्या यह  तथ्य पूर्णतया सत्य है | विशेष तौर पर औरंगजेब को हिंदू विरोधी माना जाता था या है लेकिन वह हिंदी विरोधी कतई  नहीं था | औरंगजेब ने खुद ब्रज भाषा में कवितायेँ की है तथा सामासिक संस्कृति को व्यंजित करने वाला लेखन उसके काव्य में मौजूद है |

मुगल दरबारों में हिंदी ब्रजी अवधी जैसी भाषाओं के कवि काफी सम्मान पाते थे | औरंगजेब जैसा तथाकथित कट्टर राजा भी अपनी जन्म भाषा को महत्व देता है | जाहिर सी बात है कि वह जन्म भाषा हिंदी है | जहांगीर का एक कथन है जिसमें वह शाहजहां के बारे में लिखता है कि  “अगर शब्शे अज़ मन पुरसद कि अज़ सिफ़ात पसंदीदा चीस कि बाबा खुर्रम न दारद ख्वाहम गुफ़्त कि जबान तुर्की नदारद |”  मतलब यदि कोई मुझसे पूछे कि शाहजहां में कौन सा ऐसा सद्गुण है जो उसे नहीं आता तो वह तुर्की है | शाहजहां जन्म से ही हिंदी भाषी था “हिंदी ही उसकी जन्म भाषा थी |”  यहां तक की बंदी दिनों में उसने दारा शिकोह तथा शुजा को हिंदी में ही पत्र लिखे थे |

अब इन बादशाहो की रचनाओं को देखते हैं कि इन्होने अपने लेखन में क्या अभिव्यक्त किया है –

शाहजहां लिखते हैं

“भादो कैसे दिनन माई, श्याम काहेको आवेंगे

कोकलाही कुहुक सुन छाती माती राती भई विरही

आगे उधो फूंक फूंक जरावेंगे  |”

औरंगजेब आलमगीर  की एक कविता है

“उत्तम लगन शोभा शगुन गिन गिन ब्रहमा विष्णु महेश

व्यास कीनो शाह औरंगजेब जसन तखत बैठो आनदंन |”

मोहम्मद शाह की कविता है –

“होरी की ऋतु आई सखी री चलो पिया पे खेलिये होरी |” 

या

“मुहम्मदशा पिया सदा ही रंगीले दूर न बसो बसो मेरे नेरे |” 

अबुल मुजफ्फर जलालुद्दीन मोहम्मदशाह आलम सानी की कविता –

“मो सो न पूछो ती कछु ,कटी है कैसी रात

अपने मन सु जानिए मेरे मन की बात |” 

 या 

“जी चाहे गर लाइए सियरी चालत बयार

झुक झुक के रस लीजिये आन मिले जो नार |”  

या

“सांवरो रंग सुहावनो लागत ,गावत आवत राग नयो है |

बंसी बजाए कुछ मुस्काए, लला मेरो मन लुभाय लियो है |”

बहादुर शाह जफर की कविता

जिन  गलिन  में पहले देखी लोगन की रंगरलियाँ थी

फिर देखा जो उन लोगन बिन सूनी पड़ी व गलियाँ थीं |

ख़ाक का उनका बिस्तर है और सर के नीचे पत्थर है |

हाय वह शकले प्यारी प्यारी किस चाव से पलियां थी |”

दरअसल यह सारी कविताएं एक एक करके इसलिए दी गई हैं ताकि हम भारत के सामासिक संस्कृति की शनै-शनै विकसित होती  परंपरा को समझें और यह भी समझने की कोशिश करें कि कैसे इसी  रीतिकाल के दौर में ही हिंदी उर्दू भाषा को अलगाने का काम हुआ | उस साजिश की ऐतिहासिक प्रक्रिया को समझना होगा जो अंग्रेजों ने धर्म को भाषा के साथ जोड़ने का उपक्रम  कर के किया था | औरंगजेब हो या मुहम्मद शाह किसी ने भी हिंदू देवी-देवता ,हिंदू प्रतीकों, फाग, तीज त्यौहार, जलसा या मुहर्रम इनमें किसी में भी कोई अलगौझा नहीं देखा लेकिन बाद में विकसित हुई हिंदी आलोचना ने इन मुगल बादशाहों  की कविताओं को हिंदी साहित्य इतिहास से अलग जरूर रखा |

सन 1929 के आसपास हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा जा रहा था उस समय हिंदू राष्ट्रवाद वाला विचार भी बहुत कुछ जेहन में गूंज रहा था हो सकता है कि शुक्ल जी ने कुछ बिंदु वहां से भी उधार लिए हो ? बाद की आलोचना ने भी इसी तरह का काम किया है | हालांकि बच्चन सिंह ने ‘हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास’ में रीतिकाल के परिप्रेक्ष्य  में बात करते हुए उर्दू काव्य को इसी रीतिकालीन भाग में ही शामिल किया है लेकिन यहां भी एक दिक्कत है की मुग़ल बादशाहों की पूरी हिंदी रचनाएं गायब हैं | हमें इन  रचनाओं को उनके विषय वस्तु को उनके काव्य गुण को बकायदा अध्ययन करना चाहिए |  यह उस दौर को समझने का एक उत्तम जरिया हो सकता है साथ ही साथ  इसके द्वारा हम उर्दू भाषा के बनने की इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को तमाम कवियों के काव्य में आए तथ्यों से मिला कर देख सकते हैं | इस क्रम में हमें कई नई बातें देखने समझने सुनने में आयेंगी |

शाह आलम सानी के काव्य में शादी ब्याह के अवसर पर स्त्रियों द्वारा गाए जाने वाले गीत जिससे ‘सीठना’ भी कहते हैं खूब लिखे हुए मिलते हैं | ऐसी कविताएं वही कवि लिखेगा जिसे भारतीय संस्कृति की जानकारी तो हो ही उसे इस संस्कृति से रागात्मक संबंध भी हो | खुद इन बादशाहों ने भी नायिका भेद की भी कविताएं  की हैं जो कि उस समय परंपरा के रूप में अनवरत चल रही थी | बहादुर शाह जफर की कविताओं का उदाहरण जो पीछे मैंने दिया है वह  बादशाह की आंखों से देखे हुए बेनूर होते हुए भारत का चित्र है | जिसे एक  बादशाह ने अपनी कलम से कलमबद्ध किया है | इसी दौर में एक स्त्री अपनी  व्यथा हुए लिखती हैं मैं अकेली थी बड़े लाड प्यार से पाला गया था अब अकेली हूं |

दरअसल इन कविताओं के द्वारा खत्म हो रहे रीतिकाल और आधुनिकता के बीच हो रहे संक्रमण के दौर को समझने में भी बहुत मदद मिल सकती है | जब तक रीतिकाल खत्म होता है अंगरेज पूरे देश में बस चुके थे और उन्होंने एक-एक कर क्रमशः पूरे भारत को गुलाम बनाने की प्रक्रिया को पूरा कर लिया था| रेलवे के द्वारा एकीकरण की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी थी जिसके बारे में बुकानन ने लिखा है कि ‘रेल रूपी इस्पात’ ने  भारत के गांव को बेध डाला था | यह जो पूरा रीतिकाल या रीतिमुक्त काव्य है इन सारे बदलावों स्थितियों का साक्षी रहा है | इन सारी बातों पर हिंदी आलोचना को विचार करना चाहिए तथा इन नए सूत्रों तथ्यों से तालमेल बिठाकर रीतिकाल को नए तरीके से समझने की जरूरत है| ताकि हम यह जान सके की आधुनिक काल की पूर्व पीठिका के रूप में रीतिकाल की क्या ‘ऐतिहासिक उपादेयता’ रही है | हम यह भी जान सकते हैं गुलाम होते हुए भारत के जनमानस में उथल पुथल की  प्रक्रिया चल रही थी जिससे एक लावा के रूप में 1857 की महान क्रांति होती है|

बाकी घनानंद आलम बोधा और ठाकुर और कुछ अन्य कला के रूप में प्रसिद्ध प्रिय कवियों के काव्य पर काफी साहित्यिक मार्मिक और काव्यशास्त्रीय  आलोचना की जा चुकी है | वैसे भी आलोचना सही का  या जो कुछ छुट  गया है उसको तथा तटस्थ होकर सही तथ्यों को दिखाती है | शायद रीतिमुक्त के बहाने से रीतिकाल को एक सही नजरिए से देखा जा सके क्योंकि हिंदी के ‘प्रख्यात  ब्राह्मणवादी आलोचक’ शुक्ल जी ने जाने अनजाने में ही दो विरोधाभासी बयान एक साथ अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में लिखा है | पहला “हिंदी काव्य अब पूर्ण प्रौढ़ता को पहुंच चुका था”  तथा “वागधारा बधी हुई नालियों में प्रवाहित होने लगी थी |”  देखने वाली बात यह है के पूर्ण प्रौढ़ता में पहुंचे हुए काव्य में ऐसी क्या बात है थी ज्ञान एक सीमित दायरे में होकर ही बहने लगा था | शुक्ल जी के साहित्य इतिहास लेखन की एक बड़ी खासियत यह भी है कि उन्होंने अपनी आलोचना में काफी कुछ सूत्र बिंदु छोड़ रखा है | जिस हिंदी उर्दू भाषागत अलगाव की  बात  मैं अभी थोड़ी देर पहले पिछले कुछ पन्नों में कर रहा था उसके बारे में भी स्पष्ट संकेत देते हुए लिखते हैं कि ” इसका तात्पर्य है कि संवत 1800 तक आते आते मुसलमान हिंदी से किनारा खींचने लगे थे | हिंदी हिंदुओं के लिए छोड़ कर अपने लिखने पढ़ने की भाषा फारसी ही रखना चाहते थे जिसे उर्दू कहते हैं |”  यह एक शायद बड़ी विशेषता है शुक्ल जी के इतिहास लेखन की की अपनी तमाम अच्छाइयों बुराइयों विसंगतियों के बावजूद आज भी जब हमें कहीं आगे बढ़ना होता है तो हम एक बार शुक्ल जी के इतिहास लेखन से जरूर दो-दो हाथ करते हैं| फिलहाल रीतिकाल को समग्रता में समझे जाने की जरूरत है ताकि हम उस रीतिकाल को सिर्फ श्रृंगार काल या विलासी काल के रंगीन चश्मे वाले मोह से मुक्त हो सके ।

रामानुज यादव की उच्च शिक्षा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली से हुई है।वर्तमान में जे .पी. यूनिवर्सिटी छपरा बिहार में अस्सिटेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।

रामानुज यादव

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