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मीडिया: भाषा,समाज और संस्कृति-मंजू कुमारी

भारत एक बहु आयामी तथा बहु भाषी समाज है। प्रत्येक समाज की अपनी-अपनी स्थिति, अपना परिवेश, अपनी संस्कृति है। भाषिक संरचना की दृष्टि से देखा जाय तो प्रत्येक प्रान्त की अपनी एक विशेष भाषा है। कहीं पंजाबी, कहीं तमिल, तेलगु तो कहीं बांग्ला, मराठी और गुजरती। इस सभी जगहों पर सबों द्वारा जो भाषा समझी बोली जाती है या जिसके माध्यम से जहाँ हिंदी प्रचलन में नहीं है वहाँ भी हिन्दी भाषा के द्वारा संवाद स्थापित किया जा सकता है। इसकी यह वजह भी हो सकती है कि हिंदी भाषा मात्र एक भाषा न होकर राष्ट्रभाषा है।जहाँ तक भाषा का प्रश्न है।‘भाषा भावों की अनुगामिनी होती है।’भाषा के माध्यम से हम अपनी बात एक-दूसरे तक पहुँचाने में सफल हो पाते हैं। किसी भी भाषा का एक सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य होता है। जिसके माध्यम से भाषा अपने क्षेत्र विशेष का निर्माण करने में भी सफल होती है। हिन्दी भाषा पर विचार करना संप्रेषणीय है। भारत एक विशाल देश है। यहाँ पर हिन्दी भाषा के साथ अन्य भाषा और बोलियाँ भी विद्यमान हैं। जिनमें से 22 मुख्य भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में भी शामिल किया गया है।

हिन्दी भाषा की उत्पति ‘सिन्धु’ शब्द से मानी जाती है।प्राचीन समय में ‘सिन्धु नदी’ के आस-पास का क्षेत्र ‘सिन्धु क्षेत्र’ कहलाता था।‘सिन्धु’ शब्द  की ‘स’ ध्वनि को आक्रमणकारियों द्वारा ‘ह’ ध्वनि कहा गया और उस पर ईरानी(फारसी)का प्रभाव बताया जाता है। इस प्रकार‘सिन्धु’ शब्द‘हिन्दु’ शब्द बना और ‘सिन्धी’शब्द से ‘हिन्दी’ रूप सामने आया है।यही आगे चलकर  खड़ी बोली हिन्दी के रूप में व्यवहृत होने लगी।‘हिन्दी नयी चाल में ढली-भारतेंदु’कथानक को सार्थक करती हुई हिन्दी भाषा का परिष्कृत रूप सामने आया।“हिन्दी की यह शक्ति पहली बार दिखी हो, ऐसा नहीं है,हिन्दी के नई चाल में ढलने के बाद पहला आकस्मिक परिवर्तन छायावाद के दौर में दिखता है जब भाषा में एक गुणात्मक परिवर्तन हुआ । हजारों नये शब्दों के प्रवेश के साथ ही खड़ी बोली हिन्दी सहसा अवयस्क से वयस्क हो गई। भाषा में होने वाले दूसरे आकस्मिक परिवर्तनों का दौर संभवत: 1980 के आप-पास का रहा होगा जब वैश्वीकरण, मुक्त बाजार उदार नीति, नयी प्रौद्योगिकी और सूचना क्रांति ने संक्रमणकालीन समाजों को जन्म दिया। इस समय हम फिर से एक बार हिन्दी में बहुत से नये शब्दों के प्रवेश को देख सकते हैं। इन परिवर्तनों ने हिन्दी की एक नयी संरचना निर्मित की और उसकी शुद्धता को दरकिनार करते हुए संप्रेषणीयता पर बल दिया।”1

आज हिन्दी पूरे भारत में राजभाषा के रूप में विराजमान है। भारतीय भाषा परम्परा में आज हिन्दी का वहीं स्थान है जो प्राचीनकाल में संस्कृत भाषा का था। भारत का आधा हिस्सा हिन्दी भाषी है। जहाँ सहज भाव से हिन्दी बोली और समझी जाती है। साहित्यिक दृष्टि से देखा जाय तो हिन्दी में सृजनशीलता की अद्भुत क्षमता है।‘हिन्दी’ भाषा साहित्यिक दृष्टि से भी समृद्ध भाषा है।हिन्दी भाषा एक ऐसी भाषा है जिसमें भाषा समाहार की अद्भुत शक्ति विद्यमान है। इसलिए भी हिन्दी अपनी शुरूआती दौर से ही अनेक भाषाओं के आक्रमण और संक्रमण के बावजूद अपनी पहचान को परिष्कृतकर सहज एवं जीवंत रूप को प्राप्त करती हुई, आज समकालीन दौर में भी हिन्दी भाषा अपनी अनोखी पहचान और सार्थकता बनाये हुए है,जिसे हिन्दी भाषा के विकास का सूचककहाजा सकताहै।भाषा एक समाज सापेक्ष क्रिया है जैसे-जैसे समाज बदलता रहता है वैसे-वैसे भाषा में भी बदलाव आता रहता है।इस परिवर्तनशील समय में भाषा का स्वरूप भी विकसित हो रहा है।“लोक जीवन में भाषा का उद्देश्य भले ही एक दूसरे के बीच संवाद तक सीमित हो या कहे की सूचना विचार अपनी भावनाओं को एक-दूसरे तक पहुँचाने का ही माध्यम रहा हो लेकिन जब हम व्यापक दृष्टि से इस पर विचार करते हैं तो पाते हैं की “विभिन्न संस्कृतियों के संवर्धन और सामुदायिक मेलजोल बनाये रखने में इनकी बेजोड़ भूमिका होती है।”2आज 21 वीं सदी में हिन्दी अब किसी एक क्षेत्र-विशेष की भाषा नहीं रही।वह वैश्विक हो तकनीकी कार्यों में भी प्रवेश कर रोजगार की भाषा बन रही है।हिन्दी भाषा विदेशों में भारतीय और उनकी भाषा हिन्दी एक रूप ग्रहण कर भारत की राष्ट्र भाषा के रूप में पूरे विश्व में स्वीकार की जा रही है। वैश्वीकरण के इस दौर में भारत में व्यापर और बाजार को बढ़ावा देने के लिए,हिन्दी भाषाके ज्ञान के बिना यहाँ के अधिकतम लोगों से संवाद करना संभव नहीं होगा।आज भाषा का दृश्य और श्रव्य दोनों रूप कंप्यूटर, इंटरनेट और सूचना-प्रौद्योगिकी द्वारा एक व्यापक रूप ग्रहण करने में सफल हो रही है।यह सब मीडिया की ही देन है।मीडिया के माध्यम से आज हिन्दी वैश्विक स्तर पर विराजमान हो रही है।जिसमें पत्रकारिता, जनसंचार जनमाध्यम और प्रिंट इलेक्ट्रोनिक मीडिया, सिनेमा, विज्ञापन, न्यू मिडिया आदि शामिल हैं। “इक्कीसवीं शती बीसवीं शताब्दी से भी ज्यादा तीव्र परिवर्तनों वाली तथा चमत्कारिक उपलब्धियों वाली शताब्दी सिद्ध हो रही है। विज्ञान एवं तकनीक के सहारे पूरी दुनिया एक वैश्विक गाँव में तब्दील हो रही है और स्थलीय व भौगिलिक दूरियाँ अपनी अर्थव्यवस्था खो रही हैं। वर्तमान विश्व व्यवस्था आर्थिक और व्यापारिक आधार पर ध्रुवीकरण तथा पुनर्संगठन की प्रक्रिया से गुजर रही है। ऐसी स्थित में विश्व की शक्तिशाली राष्ट्रों के महत्त्व का क्रम भी बदल रहा है। यदि अठारहवीं शताब्दी आस्ट्रिया और हंगरी के वर्चस्व की रही है तो उन्नीसवीं सदी ब्रिटेन और जर्मनी के वर्चस्व का प्रमाण देती हैं और बीसवीं सदी अमेरिका और सोवियत संघ के प्रभुत्व के रूप में विश्व विख्यात है। आज स्थित यह है कि इक्कीसवीं सदी, विश्व समुदाय की मानें तो भारत और चीन की है क्योकिं भारत और चीन विश्व की सबसे तेजी से उठने वाली अर्थव्यवस्था में से है। क्योंकि इन दोनों देशो के पास अकूत प्राकृतिक सम्पदा है तथा युवा मानव संसाधन है। जब किसी राष्ट्र को विश्व समुदाय में अपेक्षाकृत अधिक महत्त्व और स्वीकृति मिलती है तो उसके प्रति अपनी निर्भरता महत्त्वपूर्ण हो जाती है और वह राष्ट्र भी स्वयं महत्त्वपूर्ण बन जाता है। भारत की विकासमान अंतर्राष्ट्रीय स्थिति हिन्दी के लिए वरदान है।”3

पिछले दो तीन सालों में समाचार की भाषा में भारी बदलाव हुआ है। सूचना क्रांति ने भारतीय जीवन शैली पर भारी प्रभाव डाला। समाज बदला तो भाषा बदली और मीडिया का रूप भी बदल गया है।वर्तमान समय सूचना-प्रौद्योगिकी के माध्यम से वास्तविक दुनियाको आभासी दुनिया में तीव्र गति से बदल रहा है। मीडिया जगत में तरंगों की क्रांति के रूप में सूचनाओं का स्वरूप भाषा के माध्यम से ही संप्रेषित हो रहा है। जिसमें भाषाअहम भूमिका अदा कर रही है।लेकिन इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है कि इस बढ़ते मीडिया के दौर में एक क्षेत्र-विशेष की भाषा अर्थात क्षेत्रीय बोलियोंका या तो खात्मा होगा या वह वैश्विक स्तर पर विकसित हो संप्रेषण का माध्यम बनेगी। मातृभाषाओं के संरक्षण के लिए विश्व स्तर पर काम शुरू कर दिया गया है। ‘मातृभाषाओं के लिए विश्व स्तर पर यूनेस्को वर्ष-2000 से हर साल अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाता है और विभिन्न कार्यक्रमों के जरिये देशी भाषाओं और संस्कृतियों का संरक्षण तथा बहुभाषिकता को प्रोत्साहित करता है। बहुभाषिकता राष्ट्रों-समुदायों के बीच उपजी भ्रांतियों, मदभेदों को पाटने में सेतु का कार्य मिथकों-लोकोक्तियों से गुथें होने के कारण मातृभाषा के जरिये सीखने समझने की पर्याप्त, निर्बाध व सहज गुंजाइश रहती है।”4वैश्वीकरण के इस दौर में हिन्दी भाषा और साहित्य का भविष्य उज्ज्वल है। भारत जैसे विशाल देश में जो कि बाजार का सबसे बड़ा हब है, जहाँपर व्यापार-प्रवाह के लिए हिन्दी भाषा ही एक माध्यम है जिससे आपसी संप्रेषण जमीनी स्तर तक सम्भव हो सकेगा।समकालीन मीडिया में हिन्दी भाषा की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने हिन्दी भाषा को रोजगार से जोड़ा है।हिन्दी भाषा को व्यावसायिक जगत की भाषा से जोड़ने में विज्ञापनों का काफी बड़ा हाथ है। भारत में आर्थिक उदारीकरण अर्थव्यवस्था के कारण आयी बहु-राष्ट्रीय कम्पनियाँ ने पाया की हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जो भारत में एक बड़ा बाजार उपलब्ध करा सकती है। इसका एक कारण यह भी है कि भारतीय किसी भी भाषा का सम्बन्ध केवल भाषा तक सीमित न होकर पूरे भाषा-भाषी समाज से हैं जहाँ तक यह भाषा आसानी से बोली समझी जाती है। जब हम एक भाषा को केंद्र में रखकर बात करते हैं तो साथ ही साथ उससे सम्बन्धित समाज और संस्कृति का भी एक इतिहास जुड़ा होता है। जिसके बिना किसी भाषा पर बहस की ही नहीं जा सकती है। वर्तमान दुनिया बदलते भाषिक संप्रेषण के साथ विचारधारा, समाज और संस्कृति का तेवर भी बदल रहा है। टेक्नोलॉजी, बाजार और मीडिया के प्रवेश ने समाज और संस्कृति की संरचना को परिवर्तित कर दिया है।जिसके साथ ही भाषा की संवेदना भी शून्य होती चली जा रही है। बाजारीकरण ने समाज और संस्कृति के बाह्य जगत को बदलने में सफल रही तो मानवीय संवेदना को भी सुखानें से भी पीछे नहीं रही। बदलते समय और समाज के साथ मानवीय सम्वेदना शून्य हो सारे रिश्ते बाजार खरीद कर लायी गई वस्तु के समान आकर्षण समाप्त होने के बाद व्यर्थहो जाती है।‘कुंवरनारायण’ अपनी कविता के माध्यम से मानवीय संवेदना की बदलती झांकी प्रस्तुत करते हैं-

“जब भी एक कहता हैकि भावनाओं का रिश्ता तिजारत से बड़ा है

दूसरा जवाब देता है कि हर रिश्ता,

आर्थिक-बुनियाद पर खड़ा है।”

भाषा की मानवीय सम्वेदना दिन-प्रतिदिन घट रही है। सनसनी फ़ैलाने हेतु मीडिया भाषा का बोलबाला बढ़ता ही जा रहा है। भाषिक संवेदना की शून्यता मात्र खबर बनकर रह गई हैं। बाजारीकृत संस्कृति ने शब्द से उसकी जीवन्तता ख़त्म कर उसे बेजान बना दिया है। कवि ‘निलय उपाध्याय’की कविता में अभिव्यक्ति समाज और संस्कृति की बेचैनी का एक दृश्यइस प्रकार है।

“बेचते-बेचते

खरीद लेने वालों पर टिका था बाजार

खरीदते-खरीदते बिक जाने वालों पर टिकी थी,

यह दुनिया”

वैश्वीकरण के दौर मैं भाषा समाज और संस्कृति का नया रूप मीडिया की ही देन है। आधुनिकता की भाषा में कहे तो बिना मीडिया क्रांति के कथाकथित‘पिछड़े समाज और रूढ़िवादी संस्कृति से मुक्त पाना संभव न था। भारतीय समाज और संस्कृति में जहाँ ‘वैसुधेव कुटुम्बकम’ की भावना का तात्पर्य ‘पूरा विश्व परिवार है’ था। वहीं दूसरा तरफआज ‘वैश्वीकरण’का मतलब- ‘पूरा विश्व बाजार’ है। जहाँ वस्तु बनायीं जाती है, वस्तु बेची जाती है।जहाँ समाज बाजार है, लोग उपभोक्ता हैं और बाकी जो बचे उत्पादक या व्यापारी। मानवीय सम्वेदना मात्र छल है और कुछ भी नहीं। आज के समाज की यह नई सोच है। इसलिए भी समाज की हर-एक वस्तु का वजूद उसके बाजारी मूल्यों पर आधारित होता है। भाषा का अस्तित्व भी नई सोच को आत्मसात कर लेने मात्र से बचा रह सकता है।मीडिया सूचनाओं का जंजाल है। मीडिया जब उद्द्योग बन जाती है तो उसका बाजार लाभ कमाना मुख्य उद्देश्य हो जाता है।‘इसी लाभ का शिकार कहीं न कहीं हमारी भाषाएँ भी हो रही हैं।जिससे भाषा तो व्यावसायिक हो रही है लेकिन भाषा की जीवन्तता पर खतरा बढ़ता जा रहा है। इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है।

जहाँ तक भाषा या हिन्दी भाषा की ‘लिपि’ का प्रश्न है, जिसका सम्बन्धमुख्य रूप से हिन्दी भाषा केअस्तित्व और पहचान से जुड़ा है। शुरूआती दौर में जब हिन्दी फॉण्ट का विकास नहीं हुआ था उस समय हिन्दी रोमन लिपि में लिखी जाती थी और रोमन में ही हिन्दी सामग्री भी इंटरनेट पर डाली जाती थी।उस समय तक ‘देवनागरी लिपि’ में हिन्दी के लिए फॉण्ट की समस्या थी।लेकिन देखते ही देखते न्यू मीडिया की क्रांति ने शीध्र ही इस समस्याको भी दूर कर दिया।‘गूगल ट्रांसलेशन साफ्टवेयर’ के आ जाने से यूनिकोड फॉण्ट ने हिन्दी भाषा और दूसरे अन्य भाषाओं की दुनिया में क्रांति ला दी। जिसने न्यू मिडिया के विकासका रास्ता भी खोल दिया है।वर्तमान समय में हिन्दी भाषा के विकास के लिए ‘एम. एच. आर. डी.’और ‘यू.जी.सी.’ जैसी संस्था द्वारा‘ई.पी.जी.पाठशाला प्रोजेक्ट’के माध्यम से हिन्दी के पाठ्यक्रम को ऑनलाइन विश्व स्तर पर उपलब्ध करवाने और हिन्दी भाषा के वैश्विक विकास के लिए सराहनीय प्रयास किया जा रहा है।जिसके माध्यम से हिन्दी भाषा और साहित्य का परिष्कृत रूपविश्व स्तर पर सबको उपलब्ध कराया जाएगा।एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा बहुत पहले ही अपनी सारी किताबें हिन्दी, अंग्रेजी दोनों भाषाओं में ऑनलाइन भी उपलब्ध करवा दी गई हैं।भूमंडलीकरण और हिन्दी पुस्तक की सम्पादक कल्पना वर्मा के अनुसार “जो नई तकनीक है चाहे इंटरनेट हो, ई-मेल, ई-बुक, ई-कामर्स, सभी में हिन्दी का सफल प्रयोग हो रहा है। इंटरनेट पर हिन्दी की पुस्तकें, अखबार,पत्र-पत्रिकाएँ दूसरे देशों के विविध साइट्स पर उपलब्ध हैं। नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित बारह हजार पृष्ठों का विश्व हिन्दी कोश इन्टरनेट पर उपलब्ध है। हिन्दी साहित्य के लगभग दो लाख पृष्ठ महात्मा गांधी अंतर्राष्टीय विश्वविद्यालय द्वारा इंटरनेट पर डाले गए हैं। डिस्कवरी चैनल, दो कार्टून चैलन आदि द्वारा हिन्दी  में ज्ञानवर्धक सूचनाएँ प्रसारित होती हैं। टेलीविजन तथा रेडियों ने भी हिन्दी ने अपना वैश्विक स्थान बना लिया है।”5 जिसमें सामाजिक विज्ञान के साथ विज्ञान की भी किताबें हिन्दी भाषा में उपलब्ध हैं।समकालीन समाज पूर्ण रूप से टेलीविजन, इंटरनेट, मोबाईल, फेसबुक, ट्विटर, व्हाटऐप आदि तकनीकी परिवेश को ‘साइबर वर्ल्ड’ के रूप में जाना जा रहा है, जो कि किसी भी देश काल सीमा से परे है, व्यापक है और विस्तृत है। इस हद तक कि मानव मन की भावनाएं पूर्ण रूप से स्वच्छंद होकर विचरण कर रही हैं। यहाँ पर नकिसी को कोई बंधन है और न ही किसी तरह का कोई अवरोध। हर कोई अपनी स्थिति के अनुसार स्वतंत्र है और स्वच्छंद भी।लेकिन युवा पीढ़ी आज के अस्त-व्यस्त जीवन में भी अहसास को सहेजता चाहती है।‘कुंवर नारायण’ कविता-“नई किताबें” में इसी तरह के अहसास को रेखांकित किया गया है।

“अपने लिए हमेशा खोजता रहता हूँ।

किताबों की इतनी बड़ी दुनिया में,

एक जीवन संगिनी

थोड़ी अल्हड़,चुलबुली, सुन्दर आत्मीय किताब

जिसके सामने मैं भी खुल सकूं

एक किताब की तरह पन्ना पन्ना

और वह मुझे भी

प्यार से मन लगा कर पढ़े।।”

आज की युवा पीढ़ी चाहती तो है प्यार करना लेकिन मशीनीकरण के युग में स्वयं मशीन बनकर जीने पर मजबूर है। इसलिए किसी अज्ञात कवि ने ठीक ही लिखा है-

“नौकरी इस जन्म के लिए बहुत जरुरी है,

इसलिए प्रेम को अगले जन्म के लिए स्थगित करता हूँ।”

वर्तमान समय में भाषा पर पड़ रहे अंग्रेजी भाषा के प्रभाव सेइन्कार नहीं किया जा सकता है लेकिन पुन: हिन्दी अपना एक रूप बदलकर वैश्विक दौर में विकास के पथ पर अग्रसर हो रही है। भाषा विकास की दृष्टि से यह संक्रमण का काल है।लेकिन धीरे-धीरे इस काल में भी ठहराव आएगा और हिन्दी भाषा का विश्वव्यापी रूप सभी पर राज करेगा।हिन्दी भाषा के विकास में भाषा का मीडियाकृत होना एक ऐतिहासिक घटना है। इसने हिन्दी का एक बहुत बड़ा जन-क्षेत्र तैयार किया है, जिसकी कल्पना नहीं की गई थी।

समकालीन मीडियाके दौर में हिन्दी भाषा‘हिन्दी संस्कृति’ में अन्तर्निहित अस्मिताबोधको नये सिरे से समझने की जरुरत है तो दूसरी तरफ हिन्दी की अन्य बोलियों से सम्बन्ध दृढ़ करने की भी जरुरत है।इतना ही नहीं हमें उपभोक्तावादी संस्कृति की बोली हिंग्लिश के साथ संवाद करने और ‘शुद्ध हिन्दी’ भाषा रूपी मिथक हो भी तोड़ने की जरुरत है। हिन्दी भाषा का प्रारम्भ से ही समाहार रूप रहा है न कि शुद्धता जैसी बेड़ियों से जकड़ी रही है संस्कृत भाषा की तरह। हिन्दी भाषा अपनी प्रकृति के अनुसार अन्य भाषाओं से आये शब्दों का परिष्कार कर समायोजन करती और विकसित होती रही है।कोई भी भाषा अपने समय में जितनी उदार और सहज होती है वह समय के साथ-साथ बदलती रहती है, समय के साथ वह उतनी ही लोक प्रिय भाषा के रूप में विराजमान होती है। संस्कृत और लैटिन भाषा का उदाहरण हमारे सामने है। यह कहना गलत न होगा किइन दोनों भाषा के अनुयायियों ने इसे लोगों के सामने सीमित किया। इन भाषाओं ने अपने आपको व्याकरण के साथ जितना शुद्धतावादी रवैया अपनाया उतनी ज्यादा ये भाषाएँ सिमट कर रह गईं।21वीं सदी सूचना-प्रौद्योगिकी और मीडिया के माध्यम से संस्कृत भाषा को भी पुन: जीवनदान देने हेतु इसके भाषायी ज्ञान के भंडार को विश्व स्तर पर पहुँचानेहेतु का काम शुरू हो गया है।यहबदलते समय और भाषा के प्रति बदलती मानसिकता की ही भी मांग थी।“प्रख्यात आलोचक-विचारक डॉ. नामवर सिंह ने भी कहा है कि इक्कीसवीं सदी में भाषा और साहित्य का भविष्य बाजार तय करेगा। भाषा के विकास और उसके बदलाव के अध्येता डॉ.रामविलास शर्मा ने भी खडी बोली की उपत्ति का श्रेय बाजार को दिया है। बाजार ने खडी बोली के साथ-साथ अवधी, भोजपुरी,छत्तीसगढ़ी आदि क्षेत्रीय बोलियों को भी लोकप्रियता प्रदान की है। मैडोना जैसी पॉप स्टार सिंगर को भी कबीर के पदों को गाने के लिए बाजार ने ही विवश या प्रेरित किया। इंडियन ओशेन ग्रुप ने गोरख पाण्डेय के ‘हिलेला झकझोर दुनिया’(भोजपुरी) गीत को गया। अस्सी करोड़ की लोगों की भाषा का आश्रय लिए बिना आज विश्व की व्यावहारिक और व्यावसायिक गतिविधियों का संचालन सम्भव नहीं।”6इस प्रकार हिन्दी व्यावहारिकता के साथ-साथ व्यावसायिक दुनिया में तीव्रता से अपनापरचम लहराने के सफल हो चुकी है। अब वह समय दूर नहीं है जबसमाज में बनी हिन्दी भाषा के प्रति लोगों की उदासीनता स्वत: समाप्त हो जाएगीं।

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि समकालीन समय में अब हिन्दी केवल साहित्य की भाषा नहीं रही, बल्कि उसका चौमुखी विकास हो रहा है। हिन्दी भाषा अंग्रेजी भाषा की भांति अपना विस्तार कर रही है।हिन्दी भाषा आज साहित्य और विचार की भाषा मात्र का माध्यम न होकर सांस्कृतिक और सामाजिक विकास कीभी भाषा है।हिन्दी अगर आज देश के विकास की गति के साथ विकासशील से विकसित होने की ओर तीव्र गति से बढ़ रही है, तो वह सूचना क्रांति रूपी मीडिया की ही देन है।जिसके माध्यम से हिन्दी भाषा का तेवर काफी हद तक बदला है।इस बात को स्वीकार करने में किसी को कोई गुरेज नहीं होनी चाहिए कि हिन्दी भाषा को वैश्विक स्तर पर लाने में समकालीन मीडियाकी बहुत बड़ी भूमिका रही है।अंतत: भाषा समाज और संस्कृति की महत्ता को नेल्सन मंडेला के शब्दों में कहें तो ‘जब किसी को कोई बात उस भाषा में बताते हैं जिसे वह जानता है तो कथन उसके मस्तिष्क तक पहुँचता है और जब उसकी अपनी भाषा में बताते हैं तो संवाद दिल को छू जाता है।’7वर्तमान दुनिया में वैश्वीकृत समाज की बाजारूभाषा में मरती सम्वेदना को‘कुँवर नारायण’ की कविता“भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में कविता”में रेखांकित बिम्ब, जिसकी तरफ इशारा करते हुए मैं अपने लेख समाप्त करुँगी-

“एक भाषा जब सूखती

शब्द खोने लगते अपना कवित्त

भावों की ताजगी

विचारों की सत्यता

बढ़ने लगते लोगों के बीच

अपरिचय के उजाड़ और खाइयाँ”

संदर्भ ग्रन्थ सूची:

  1. संपादक, वर्मा कल्पना,भूमंडलीकरण और हिन्दी,लोकभारती,प्रकाशन-इलाहाबाद-पृ.सं.154
  2. दैनिक जागरण समाचार पत्र (23फरवरी2018)-हरीश बडथ्वाल-लेख-‘स्वदेशी भाषाओं की अनदेखी’ पेज-8)
  3. संपादक, वर्मा कल्पना,भूमंडलीकरण और हिन्दी,लोकभारती,प्रकाशन-इलाहाबाद-पृ.सं.168
  4. दैनिक जागरण समाचार पत्र (23फरवरी2018)-हरीश बडथ्वाल-लेख-‘स्वदेशी भाषाओं की अनदेखी’ पेज-8)
  5. संपादक, वर्मा कल्पना,भूमंडलीकरण और हिन्दी,लोकभारती,प्रकाशन-इलाहाबाद-पृ.सं.42
  6. वहीं पृष्ठ सं.148
  7. दैनिक जागरण समाचार पत्र (23फरवरी2018)-हरीश बडथ्वाल-लेख-‘स्वदेशी भाषाओं की अनदेखी’ पेज-8)
  8. हिन्दी समय.कॉम से कुछ कविताएँ…
  9. जोशी, रामशरण. मीडिया और विमर्श, सामयिक प्रकाशन. दिल्ली-110002
  10. डक, डॉ टी.एम. सामाजिक चिन्तन (भाग दो) हरियाणा साहित्य प्रकाशन अकादमी,चंडीगढ़
  11. दुबे, अभय कुमार. (सम्पादक) भारत का भूमण्डलीकरण, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली-110002
  12. पंडित, सुरेश. वैश्वीकरण के दौर में समाज और संस्कृति, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली-110032
  13. संपादक –आर अनुराधा, न्यू मिडिया-इन्टरनेट की भाषा चुनौतियाँ और संभावनाएं ,राधाकृष्ण प्रकाशन –नई दिल्ली 2012
  14. पालीवाल कृष्णदत्त,हिन्दी आलोचना समकालीन परिदृश्य,सामयिक बुक्स नई दिल्ली-110002
  15. एम.एन.श्री निवास,आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन राजकमल प्रकाशन -110032

मंजू कुमारी ने उच्च शिक्षा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली से प्राप्त किया है।वर्तमान में राजकीय महाविद्यालय ढलियारा,कांगड़ा,हिमाचल प्रदेश में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।

मंजू कुमारी

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