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भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था कायम है जो चार स्तंभों पर टिकी है- विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका व मीडिया। स्वस्थ लोकतंत्र को स्थापित करने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसे लोकतंत्र का आधार माना जाता है। मीडिया सम्पूर्ण विश्व में घटित होने वाली सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक गतिविधियों से अवगत कराती है। लोकतंत्र के लिए बेहतर दुनिया या भविष्य निर्मित करने की शक्ति मीडिया के अंदर समाहित है।

मीडिया जनता व सरकार के मध्य बनी दूरी को मिटाने का कार्य करती है। वह गण और तंत्र के बीच पुल का कार्य करती है। यह सरकार के द्वारा किए गए कार्यों की आलोचनात्मक समीक्षा करती है। मीडिया में वो शक्ति निहित है जो शक्तियां अन्य किसी में भी नहीं मिलती है क्योंकि “अकबर इलाहबादी” लिखते हैं कि “खींचों न कमानों को न तलवार निकालो। जब तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालो।।”

विगत कुछ वर्षों से मीडिया का स्तर गिरता जा रहा है। नैतिकता, निष्पक्षता व वाचडॉग सिर्फ किताबों और मीडिया सेमिनारों तक ही सीमित रह गए है, टेलीविजन पर होने वाली बहसों में टेबलपिटिए पत्रकारों की तादाद बढ़ती जा रही है जिनमें पत्रकारिकता का कोई गुण नजर नहीं आता है, ये पत्रकार पूरे बहस के दौरान बस तेज तेज चिल्लाने और टेबल पीटने का कार्य करते हैं। ये चैनल तर्कसंगत बहस के बजाय शोरगुल का एक उदाहरण बनते जा रहें हैं सार्थक व तथ्यपरक चर्चाओं के बजाय कुतर्क का इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रवक्ताओं कि तुलना पृथ्वीराज और जयचन्द से की जाने लगी है। अभी हाल ही में बहस के तुरन्त बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव त्यागी की मौत हो गई जिसका मुख्य कारण तेज तर्रार बहस को ही माना जा रहा है।

मीडिया अब स्वयं ही जांचकर्ता, वकील और जज बन रही है। मीडिया ट्रायल करके वह संदेहास्पद व्यक्ति को भी दोषी करार दे रही है, इस वजह से जनमानस में उस व्यक्ति के प्रति आक्रोश उमड़ता है और उसके व्यक्तित्व को नुक़सान पहुंचता है। मीडिया ट्रायल के कारण जांच एजेंसियों की जांचो से लेकर कोर्ट के फैसले तक प्रभावित होने की संभावना बनी रहती है। बहुचर्चित केस आरुषि हत्याकांड में मीडिया ने उसके माता- पिता ने हत्यारा बना दिया परन्तु बाद में तलवार दंपति को कोर्ट ने बरी कर दिया। वहीं सुशांत सिंह राजपूत मामले में भी मीडिया संस्थान रिया चक्रवर्ती को हत्यारा साबित करने पर तुले हुए हैं जबकि अभी सीबीआई की पूछताछ भी पूरी नहीं हुई है।
मीडिया के गिरते स्तर के मुख्य कारणों में मीडिया समूहों की उद्योगपतियों, राजनेताओं व आपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्तियों से सांठगांठ है। ये असमाजिक तत्व पर्दे के पीछे बैठकर खबरों को नियंत्रित अथवा तोड़ने- मरोड़ने का कार्य करते हैं जो जनमानस को प्रभावित करते है और दंगों का कारण बनते हैं। विगत दिल्ली दंगों में मीडिया ने जहर उगला जिससे दंगा और भी बढ़ गया। खबरों की सत्यता जाने बिना मीडिया ने दंगों के दौरान उसे प्रसारित कर दिया जिससे माहौल अनियंत्रित हो गया।

मीडिया से जहां उम्मीद की जाती है कि वह एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाएगी और सरकार की नीतियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करेगी परन्तु मीडिया समूह सरकार के प्रवक्ता के रूप में कार्य कर रहें हैं। सत्तासीन दल की बड़ाई भारतीय मीडिया की मुख्य प्रवृत्तियों में शामिल होती जा रही है। मीडिया सत्ता द्वारा किए गए गलत फैसलों को संगठित तरीके से सही करने पर तुले होते हैं। झूठ को बारंबार सच कहकर इसे भारतीयों के मन में डालना चाहते हैं परन्तु एकाध मीडिया चैनल अभी भी निष्पक्षता की लौ को बुझने नहीं दे रहे है और जनमानस की समस्याओं को मुख्यधारा की मीडिया में ला रहें हैं।

जनमानस की समस्याओं पर बात करने के बजाए मीडिया चैनल बेतुके बयानों को अधिक तरजीह दे रहें है। देश में कोढ़ कि तरह सैकड़ों वर्षों से व्याप्त बेरोजगारी, गरीबी, महिला उत्पीडन या आवास तथा स्वास्थ्य समस्याओं के स्थान पर नेताओं के बिगड़े तथा बड़बोले बयानों को अधिक प्राथमिकता दे रहें हैं। रसोड़े में कौन था या व तू-तू मैं-मैं में कौन जीता जैसे विषय मीडिया चैनलों को अधिक भा रहें हैं क्योंकि इससे उनकी टीआरपी में वृद्धि होती है।

मीडिया वह दर्पण है जो वास्तविकताओं व कटु सत्यों को दिखाने का कार्य करती है परन्तु पेड न्यूज ने इसे भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। पेड न्यूज का अर्थ होता है – मीडिया द्वारा पैसा लेकर किसी विशेष पक्ष के लिए समाचार चलाना। पेड न्यूज की वजह से समाचार चैनलों की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। आश्चर्य तब होता है जब संपादक व मीडिया की निगरानी करने वाली मानक संस्थाएं चुप बैठी हैं लगता है कि मीडिया की आचार संहिता को वो भुला बैठी हैं।

भारतीय मीडिया ने सार्थक मुद्दों पर चर्चा के बजाय ग्लैमर की दुनिया को अधिक महत्व दे दिया है। सभी मीडिया चैनलों पर फिल्मों व टीवी धारावाहिकों में चलने वाले किस्सों की बाकायदा रिपोर्टिंग करते हैं और उनके किस्सों को मुख्य न्यूज बना कर प्रसारित करते हैं। दिन-दिन भर अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की शादी का सीधा प्रसारण किया जाता है। ग्लैमरस क्षेत्र की खबरों और चित्रों को बेच कर मीडिया ने इसे अपनी कमाई का साधन बना लिया है।

मीडिया का क्षय भाषाई स्तर पर भी हुआ है। वक्ता सरेआम एक दूसरे को अपशब्द कह रहें हैं और हाथापाई कर रहें हैं। मुंहतोड़ जवाब, ताबड़तोड़ छापेमारी, पटखनी देना जैसे शब्दों का उपयोग मीडिया के भाषाई पतन को दर्शाते हैं। अभी हाल ही में चीनी सेना के गलवान घाटी से पीछे हटने को एक प्रतिष्ठित मीडिया चैनल ने इसे भारत चीन युद्ध करार दिया तथा भारत को उसमें विजयी भी घोषित कर दिया।

मीडिया का जितना उपयोग हम करते हैं उससे एक बात स्पष्ट है कि हमारे जीवन में उसकी गहरी पैठ है। समाज को नकारात्मक दिशा में जाने तथा मीडिया को रसातल में जाने से निष्पक्ष पत्रकार ही बचा सकते हैं। जनता से जुड़ी समस्याएं तथा सरकार के आलोचनात्मक मूल्यांकन से ही मीडिया की प्रतिष्ठा को बचाया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायधीश यू यू ललित ने कहा था कि मीडिया को रिपोर्टिंग में आत्मसंयम बरतना चाहिए। पत्रकारों को निजी हित छोड़कर कलम की ताकत को पहचानना होगा तथा संविधान से प्राप्त अधिकारों का सार्थक प्रयोग करना होगा। अस्तित्व व वर्चस्व की लड़ाई को छोड़कर तथ्यपरक खबरों की तरफ मीडिया को अपना ध्यान ले जाना चाहिए।

अभिषेक कुमार शर्मा, दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं।

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