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मिथक : कुछ विचार-डॉ.अनिरुद्ध यादव

  मिथक अंग्रेजी शब्द ‘मिथ’ का हिन्दी रूपांतरण है जिसका अर्थ  कल्पित कथा या पौराणिक कथा होता है। वस्तुतः मिथक एक ऐसी परंपरागत गल्प कथा है जिसका संबंध अतिमानवीय या ईश्वरीय घटनाओं से होता है। जिसमें चमत्कार एवं कौतूहल का विशेष गुण पाया जाता है। चूंकि मिथक धर्म, आस्था और विश्वास पर चलता है इसलिए इसे तर्क पर नहीं कसा जा सकता। बावजूद इसके इनकी क्रोनोलॉजी ज्यादातर व्यवस्थित होती है। एक कथा से दूसरे कथा की तारतम्यता  पाई जाती है।

       मिथक पर विश्व में सर्वप्रथम यूनान और जर्मनी में विचार किया गया लेकिन अमेरिका में मिथकीय आचोलना का विस्तार सर्वाधिक हुआ। फ़्रेजर, हैरिसन, एम एम कार्नेफोर्ड, फ्रायड, रेने वेलेक आदि ने मिथक पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। जेन हैरिसन कहते है ‘मिथक को हम रूप प्रतीक और कर्मकांड को कर्म प्रतीक कह सकते है।’ जबकि रेने वेलेक का कहना है “मिथक गुमनाम ढंग से रची गई कहानियां हैं। जो सृष्टि के उद्भव और नियति का वर्णन करती हैं।” फ्रायड मिथक को दमित वासनाओं को व्यक्त करने का माध्यम कहते हैं। भारतीय विद्वानों में डॉ हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ नगेन्द्र, रमेश कुंतल मेघ ने मिथक को देखने समझने का प्रयास किया है। जिसमें डॉ नगेन्द्र और डॉ हजारीप्रसाद द्विवेदी दोनों ने ही मिथक पर भाषा की सृजनात्मकता के संदर्भ में ही विचार किया है जबकि रमेश कुंतल मेघ ने मिथकीय आलोचना को विस्तार दिया।

    इसके साथ ही मिथक और इतिहास के अंतःसंबंधों को समझना भी आवश्यक है। मिथक और इतिहास के संबंध को दो रूपों में देखा और समझा जा सकता है- (1) मिथक के माध्यम से इतिहास का निर्माण। इसके अन्तर्गत हमारे मिथकीय आख्यान आते हैं जिनके आधार पर हमें इतिहास लेखन की सामग्री प्राप्त होती है।उदाहरण के तौर पर ऋग्वेद से उस समय के सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्था को समझने में मदद मिलती है। जाति का प्रारंभिक रूप ब्रह्म के दैवीय सिद्धान्त में है जो ऋग्वेद के 10वें मंडल में वर्णित है जिनका उपयोग इतिहास लेखन में किया गया। इसी तरह पुराणों में कई राजवंशों का इतिहास मिलता है।जैसे वायु पुराण में मौर्य कालीन शासकों तथा मत्स्य पुराण में गुप्त काल के राजाओं का इतिहास सुरक्षित है जो इस काल के इतिहास लेखन का महत्वपूर्ण स्रोत है। महाभारत और रामायण से उस समय के समाज के रीति-रिवाज, मान्यताएं, समाज स्तरीकरण सब कुछ देखा समझा जा सकता है। (2) दूसरा है इतिहास के माध्यम से मिथक का निर्माण। इसका उदाहरण हमें विदेशों में ज़्यादा दिखाई देता है जैसे इस्लाम धर्म के प्रवर्तक पैगम्बर साहब एक ऐतिहासिक व्यक्ति हैं लेकिन आज के दौर में वे मिथक के रूप में तब्दील हो गए है इसी तरह ईसाई धर्म के ईसा मसीह भी ऐतिहासिक पात्र हैं जो अब मिथकीय चरित्र के रूप में बदल दिए गए हैं। भारतीय इतिहास में विश्वामित्र, गौतम बुद्ध ,महावीर जैन आदि ऐतिहासिक व्यक्तियों को मिथकीय रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। इस तरह से हम समझ सकते हैं कि मिथक और इतिहास में एक संश्लिष्ट संबंध पाया जाता है कभी मिथक इतिहास लिखने में सहायता करता है तो कभी इतिहास खुद मिथक बन जाता है। इसके पीछे का कारण यह है कि मिथक समाज के आदर्श,रीति रिवाज, सभ्यता एवं संस्कृति,नैतिकता, ईमानदारी,पाप-पुण्य, लोक-परलोक आदि निर्मित करने का एक हाइपोथेटिकल अप्रोच है जिसके माध्यम से हम इतिहास की नब्ज टटोलते हैं चूंकि इतिहास का भी एक दर्शन होता है इसलिए कभी-कभी इतिहास भी दर्शन की वस्तु बनकर  मिथक में तब्दील हो जाता है।

    अब एक प्रश्न यह उठता है कि मिथक का परम्परा से क्या संबंध है? इसको समझने के लिए हमें पहले समझना होगा परंपरा किसे कहते है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने परम्परा का अर्थ बताते हुए कहा हैं ‘परम्परा का शब्दार्थ है- एक से दूसरे को, दूसरे से तीसरे को तथा इसी तरह आगे को दिया जाने वाला क्रम। परम्परा इतिहास का कटता संवरता और निखरता रूप होता है।’ मिथक भी पीढ़ियों तक दोहराए जाने वाली कथा है लेकिन इसे परम्परा नहीं कहा जा सकता। वस्तुतः मिथक का स्वरूप बहुत विस्तृत होता है जिसमें परम्परा को सम्पोषित करने की शक्ति पाई जाती है। फिर भी मिथक और परम्परा एक बिन्दु पर इस रूप में मिलते हैं कि दोनों ही मूल्य आधारित होते हैं। मिथकीय कथा किसी न किसी सामाजिक राजनैतिक या आर्थिक मूल्य पर ही गढ़े गए है। परम्परा तो अनिवार्य रूप से मूल्यों की वाहक होती है जो प्रतिगामी मूल्य होते हैं वे स्वयं नष्ट हो जाते हैं। एक यूनानी मान्यता के अनुसार सात पीढियों के बाद कोई कथा मिथक का रूप ले लेती है। इस तरह समझा जा सकता है कि परम्परा के निर्माण में मिथक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

              अब मिथकीय आख्यानों की विषयवस्तु और भाषा से उसके संबंध पर विचार कर लेते हैं। मिथकीय आख्यानों के विषयवस्तु में सृष्टि की रचना, ईश्वर का अस्तित्व, जीवन-मृत्यु का रहस्य, नरक की कल्पना या फिर प्राकृतिक घटनाएं जिनका संबंध महामानव से हो आदि आते हैं। मिथक को फ्रायड स्वप्न के रूप में देखता है और कहता है कि मनुष्य अपनी दमित वासनाओं, इच्छाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति मिथक के जरिए करने का प्रयास करता है। अर्थात मिथक का विषय मनोभावों से होता है। जैसे शिव के ज्योतिर्लिंग की पूजा  की पूजा कहीं न कहीं मनुष्य के दमित यौनाचार को रेखांखित करता है। पुरुरवा-उर्वशी,विश्वामित्र-मेनका आदि की कथा को भी उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। अब मिथक और भाषा के अंतर्संबंध पर विचार कर लेते हैं। मैक्समूलर कहते हैं कि ‘मिथक भाषा की शक्ति को बहुत बढ़ा देते हैं।’ इसी से मिलता जुलता विचार आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी का भी है, वे कहते हैं ‘मिथक तत्त्व वस्तुतः भाषा का पूरक है। सारी भाषा ही इसके बल पर खङी है।’ रमेश कुंतल के अनुसार मिथक मानवजाति का सामूहिक स्वप्न एवं सामूहिक अनुभव है और स्वप्न एक व्यक्ति की सुप्त आकांक्षा। उपर्युक्त विद्वानों के मत को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि मिथक मनुष्य की स्वप्नों उसकी आकांक्षाओं और उसकी समस्याओं से उद्भूत एक काल्पनिक कथा है। जिसने भाषा को सबृद्धि किया। जैसे अहल्या जैसे मिथकीय पात्र के उपयोग से शाप खाई स्त्री ध्वनित होती है। इसी प्रकार कर्ण कहने से महादानी का भाव आता है, युधिष्ठिर से सत्य बोलने वाले का बोध होता है। इससे स्पष्ट है कि मिथक का उपयोग कर कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा बातें कही जा सकती हैं इसी को भाषा की शक्ति बढ़ाना कहते हैं। हाँ इसका रूप अलग-अलग हो सकता है। मनुष्य जाति इन मिथकीय कथा में विश्वास करें इसके लिए जहाँ एक तरफ इसका दैवीय विधान किया गया है वहीं दूसरी तरफ उसे मानवीय अवतार (अवतारवाद) से भी जोड़ा गया।

       अब प्रश्न उठता है कि मिथक की शुरुआत कब हुई? इसका कोई प्रामाणिक साक्ष्य मौजूद नहीं जिससे तिथि निर्धारित किया जा सके। फिर भी इतना अवश्य कहा जा सकता है कि प्रकृति के रहस्यों को समझने के क्रम में मिथकों की शुरूआत हुई होगी। मनुष्य प्राकृतिक रहस्यों और अपनी समस्याओं का हल खोजने के क्रम में ऐसी काल्पनिक कथाओं या आख्यानों की रचना की होगी जो अतिमानवीय (देवता आदि) गुणों से परिपूर्ण थी जो इनकी समस्या और इच्छाओं दोनों की पूर्ति की शक्ति रखती हो। इन्होंने देवताओं का मानवीकरण भी किया ताकि लोगों की विश्वसनीयता बनाई जा सके। जैसे अग्नि देवता, वायु देवता, अश्विन, मरुत, वरुण, इंद्र आदि। इस तरह ये कहा जा सकता है कि मिथकीय आख्यानों की शुरुआत मानवीय सभ्यता के विकास के साथ ही शुरु हो गई थीं और समय के साथ विकसित होती रही।

     उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है कि मिथक अतिमानवीय आख्यान हैं जिसमें मनुष्यों ने अपनी समस्या का हल तथा अपनी आशा-आकांक्षा एवं भावों की पूर्ति करने के लिए किया। साथ ही यह सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक संहिता के रूप में भी सामने आती है जो मूल्य आधारित है और परम्परा के वाहक भी बन जाते हैं। मिथक जहाँ इतिहास से सामग्री लेता है वही इतिहास निर्मिति में भी सहायक होता है। हालांकि ज्यादातर मिथक कल्पना आधारित होते हैं। मिथक के अध्ययन और विश्लेषण में इन सभी बिंदुओं को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है।

डॉ.अनिरुद्ध यादव ने उच्च शिक्षा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली और दिल्ली विश्वविद्यालय से प्राप्त किया है।वर्तमान में उत्तर प्रदेश राज्य सेवा में अधिकारी हैं।

डॉ.अनिरुद्ध यादव

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