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भारत में घरेलू अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता का सवाल -डॉ.रमेश कुमार

हाल फिलहाल में देश के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी ने कोरोना जैसी वैश्विक आपदा से निपटने के लिए श्रमिकों, कामगारों और आम जनता के साथ-साथ कुटीर उद्योगों, लघु, और मँझोले उद्योगों के लिए राहत स्वरूप 20 लाख करोड़ की राशि का पैकेज जारी किया है। साथ ही भारत को इस वैश्विक महामारी से निपटने के लिए “आत्मनिर्भर भारत” बनने का मंत्र भी दिया था। प्रधानमंत्री के अनुसार इस पैकेज के माध्यम से देश के विभिन्न वर्गों, व्यावसायिकों और आर्थिक व्यवस्था की कड़ियों से देश के विकास में योगदान देने का एक महत्वपूर्ण पूल तैयार होगा। लैंड, लेबर, लिक्वीडिटी और लॉज सभी इस पैकेज से लाभान्वित होंगे जिससे अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत होगी।

      हालांकि, इस संबंध में जिस ‘आत्मनिर्भर होने’ का मंत्र दिया गया है, उसमें आत्मनिर्भरता का क्या अभिप्राय है, उसका स्वरूप क्या है, घरेलू अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता के अंतर्संबंध क्या होते हैं, इसे समझना बेहद जरूरी है। आत्मनिर्भर यानि स्वरोजगार के माध्यम से अपनी जीविका, जीवनशैली और निजी विकास की आर्थिक बुनियाद मजबूत करके राष्ट्रीय आय में योगदान देना। अर्थात सरकारी योजनाओं का सहयोग लेते हुए स्वरोजगार को बढ़ावा देना ताकि अर्थव्यवस्था की विकास यात्रा में लघु, मध्यम और कुटीर उद्योगों के जरिये देश की जीडीपी के उन्नयन में सहयोग मिल सके। आत्मनिर्भरता के दो स्वरूप हैं पहला ग्रामीण क्षेत्रों में और दूसरा शहरी या मेट्रोपोलिटन क्षेत्र में। इस आपदा से हर क्षेत्र में नुकसान हुआ है। देखा जाए तो इस नुकसान से बचने और अपने स्वरोजगार को बनाए रखने हेतु छोटे कस्बे, गांवों में लोगों का अपना व्यवसाय ही आत्मनिर्भरता की बुनियाद है, क्योंकि वे किसी सरकारी नौकरी के पीछे भागने का प्रयास कम करते हैं। बल्कि ये लोग सरकार को अपने व्यवसाय से अप्रत्यक्ष रूप में टैक्स अवश्य अदा करते हैं। प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भरता के तहत पाँच स्तंभ बताए हैं। पहला आर्थिक संवर्धन करना, दूसरा आधुनिकतम इनफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर ज़ोर देना, तीसरा टेक्नालजी सिस्टम को और अधिक विकसित बनाना और चौथा डेमोग्राफी अर्थात जनसंख्या का सदुपयोग कौशल विकास के उन्नयन में लगाना और पाँचवाँ है- डिमांड और सप्लाइ चेन की प्रक्रिया को मजबूत बनाना। इन पांचों स्तंभों के माध्यम से अर्थव्यवस्था का आधार मजबूत बनाने की दिशा में एक बेहतर प्रयास की शुरुआत हुई है।

      भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में यदि हम देखें तो वे सभी लोग आत्मनिर्भर हैं जो भारत सरकार अथवा राज्य सरकार और उनके अधीन किसी भी पद पर कार्यरत नहीं हैं। जितने भी स्वरोजगार में लगे हुए आम लोग या श्रमिक-मजदूर वर्ग हैं और सरकारों को किसी न किसी रूप में टैक्स अदा कर रहे हैं, वे आत्मनिर्भर की श्रेणी में गिने जा सकते हैं। ग्रामीण या शहरी क्षेत्रों में लघु अथवा सूक्ष्म उद्योगो के माध्यम से स्वयं भी लाभान्वित होना और दूसरों को रोजगार प्रदान करना भी आत्मनिर्भर बनने और देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देना है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं घरों में रहकर प्रायः छोटे-मोटे व्यवसाय करके स्वयं को आत्मनिर्भर तो बनाती ही हैं, साथ में अपने परिवार का भरण-पोषण भी करती हैं, और इस तरह स्थानीय स्तर पर विपणन क्षेत्रों के माध्यम से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में अपना सहयोग भी अप्रत्यक्ष रूप में देती हैं। लघु व्यवसायों जैसे अचार या नमकीन, बिस्किट इत्यादि की पैकेजिंग करना, कागज या प्लास्टिक की वस्तुएँ या माचिस तैयार करना, सिलाई-बुनाई-कढ़ाई और हैंडलूम, बेकरी उद्योग के विभिन्न उत्पाद, कृषि क्षेत्र में गेहूं-चावल या मसाले क्रय-बिक्रय करना, और उनका स्थानीय स्तर पर व्यापार में व्यापक विपणन करके सभी आत्मनिर्भरता को सार्थक बना रहे हैं। ऐसे घरेलू स्तर के कार्यों में निचले से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में योगदान किया जा रहा है। ग्रामीण या छोटे कस्बों में छोटे-छोटे काम धंधे ही आत्मनिर्भरता की बुनियाद हैं। आत्मनिर्भर होना, आज वैश्विक स्तर पर शक्तिशाली, सम्पन्न और खुशहाल होने का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया है। जापान, कोरिया, थायलैंड या फिर यूरोपीय देशों से हम सीख सकते हैं। ये देश हमारे सामने प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। 

      ‘आत्मनिर्भर अभियान’ का उद्देश्य है लोगों को आत्मनिर्भर बनाना, जिसके लिए हाल ही में पीएम स्वनिधि योजना या पीएम स्ट्रीट वेंडर्स निधि योजना की शुरुआत की गई है। ऐसी कई योजनाओं के माध्यम से देशभर के युवाओं को स्वरोजगार देने की पहल शुरू की गई है, जिससे अर्थव्यवस्था में होने वाले नुकसान से बचा जा सके और गरीबी का ग्राफ, भुखमरी भी ऊपर न बढ़ने पाए। आत्मनिर्भरता के दार्शनिक पहलुओं को यदि देखा जाए तो महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज, सर्वोदय और स्वावलंबन, आत्मनिर्भरता जैसे मुद्दों पर बहुत पहले बात की थी। वास्तव में, आज हमें ऐसे ही सस्ते, टिकाऊ तकनीक वाली व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की जरूरत है, जिनसे गाँव, कस्बे, शहर और राष्ट्र मजबूत अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर हो सकें। यह स्वावलंबन या आत्मनिर्भरता केवल व्यक्ति के रोजगार पाने या आत्मनिर्भर होने तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र को भी खाद्य सुरक्षा, आंतरिक रक्षा, विनिर्माण और अवसंरचना के मामले में आत्मनिर्भर होना आवश्यक है। आज़ादी के कई वर्षों तक भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर नहीं था लेकिन जब साठ के दशक में हुई हरित क्रान्ति का उदय हुआ तो भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बना। कृषि क्षेत्र में यह भारत की आत्मनिर्भरता का ही नतीजा रहा कि देश की जनता की खुशहाली में स्वाभाविक तौर पर वृद्धि हुई थी। भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने कहा था- “एक राष्ट्र की शक्ति उसकी आत्मनिर्भरता में निहित है, दूसरे से उधार लेकर काम चलाने में नहीं।” आत्मनिर्भरता से ही मनुष्य की प्रगति सम्भव है और यह एक बड़ा सत्य है। पूर्वोत्तर भारत एवं झारखंड, मध्य प्रदेश, ओड़ीशा, छत्तीगढ़ और राजस्थान आदि राज्यों में लौह, लकड़ी और वन संसाधन द्वारा विभिन्न वस्तुएँ निमित की जाती हैं और उन्हें स्थानीय विपणन व्यवस्था में शामिल किया जाता है। आज हजारों-लाखों की संख्या में गरीब, कमजोर और आदिवासी वर्ग के वंचित समुदाय स्वावलंबित या आत्मनिर्भर हैं। वे स्थानीय स्तर पर ही हस्तकला से तैयार तमाम वस्तुएँ, लकड़ी की सुंदर वस्तुएँ और अन्य चीजों के माध्यम से देश की आर्थिक व्यवस्था में अपना योगदान कर रहे हैं।

      चूंकि वर्तमान में, भारत विश्व में तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है और कोरोना जैसी महामारी से जूझने के कारण अर्थव्यवस्था में काफी नुकसान होने की भी संभावना है, इसलिए इसे मजबूत बनाए रखने हेतु ग्रामीण और घरेलू विनिर्माण पर भी फोकस किया जा रहा है जिसके लिए विभिन्न सरकारी योजनाएँ अमल में लाई जा रही हैं। स्थानीय क्षेत्रों में मत्स्य पालन, कृषि, पशुपालन, किचेन-गार्डेन के उत्पाद, दुग्ध उत्पादन एवं दैनिक उपयोग की चीजें अखबार-वितरण आदि आर्थिक व्यवस्था में योगदान कर रही हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन जैसी योजनाएँ इसी दिशा में लोगों को रोजगार प्रदान करने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए शुरू की गई हैं।

      आज पूरे विश्व में भारत की परंपरागत रूप से निर्मित वस्तुएँ विपणन में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। इस क्रम में हमें आज पुनः ये अवसर मिला है कि हम अपनी ग्रामीण उत्पाद की अवधारणा को पुनर्जीवित करें और घरेलू उत्पादों के माध्यम से राष्ट्र शक्ति को मजबूत बनाने के क्रम में सहयोग दें। चीन द्वारा जनित कोरोना के कारण आज भारत जैसे विशाल कृषि प्रधान देश को सालाना लगभग 1500 करोड़ डॉलर का नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए अवसंरचना विकास एवं इलेक्ट्रोनिक कलपुर्ज़े के निर्माण के साथ ही कृषि के क्षेत्र में हमें खाद इत्यादि के लिए स्वयं पर निर्भर बनना पड़ेगा, न कि चीन द्वारा निर्यात किए गए रसायनिक खादों या अन्य सामानों पर। आज देशभर में ऐसे शोध संस्थान और कंपनियाँ, फैक्ट्रियाँ मौजूद हैं जहां सरकार को नीतिगत फैसले लेते हुए ऐसा रोडमैप करना चाहिए ताकि अधिक से अधिक चीज़ों का उत्पादन और निर्माण अपने देश में संभव हो सके और हमारी आत्मनिर्भरता स्वयं हम पर बने। यही आत्मनिर्भर होने का मूलमंत्र है, यही घरेलू अर्थव्यवस्था में संवृद्धि का आधार है।

डॉ.रमेश कुमार ने उच्च शिक्षा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से प्राप्त किया है।

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