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पिछले  कुछ वर्षों से भारतीय विदेश नीति असंतुलन के दौर से गुजर रही है | जिसकी कई वजहें है जिनमें से एक बड़ी वहज भारत के विदेश नीति का अमेरिका की तरफ अधिक झुकाव है | ईरान के साथ चारबहार-ज़ाहेदान रेल लाइन समझौता से भारत  का बाहर होना ;चीन के साथ दोकलाम तथा गलवान घाटी संघर्ष ; नेपाल द्वारा अपने देश का नया नक्शा जारी करना ; तालिबान-अमेरिका शान्ति समझौता ; रूस -पाकिस्तान फ्रेंडशिप –ड्रिल; इंडो – पेसिफ़िक में क्वाड अलायन्स इत्यादि ने भारत के सामने चुनौतियाँ पेश की है जिसके कारण हमारा राष्ट्रीय हित प्रभावित हो रहा है|

महत्वपूण बिंदु( Keypoints)-

  1. चारबहार- ज़ाहेदान रेल लाइन समझौता
  2. गलवान घाटी संघर्ष
  3. तालिबान- अमेरिका शान्ति समझौता
  4. फ्रेंडशिप –ड्रिल
  5. क्वाड अलायन्स 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए को भारतीय राजनीति की बागडोर दूसरे कार्यकाल जिसे लोकप्रिय भाषा में मोदी सरकार 2.0 भी कहा जाता है, के लिए पहले कार्यकाल से ज्यादा सीटें प्रदान कर प्रचंड बहुमत के साथ भारत की जनता ने सत्ता सौंपी। इस सरकार के पूरे कार्यकाल को देखें तो इस सरकार ने कुछ अप्रत्याशित सफलताएं हासिल की है मसलन-विद्युतीकरण, आवास निर्माण, शौचालय निर्माण, अर्थव्यवस्था के आकार में वृद्धि (जीडीपी की दृष्टि से), आंतरिक सुरक्षा में वृद्धि , संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाना, एफडीआई या प्रत्यक्ष विदेशी निवेश  के अंतर प्रवाह  में वृद्धि आदि जैसे क्षेत्रों में इसे देखा जा सकता है।

         लेकिन यदि हम इस सरकार की विदेश नीति की बात करें तो सफलता का यह दायरा कुछ क्षेत्रों तक सिमट कर रह जाता है। वर्तमान सरकार की विदेश नीति का सूक्ष्म अन्वेषण करने पर हमारे सामने कुछ प्रश्न सहज ही  उभर कर आते हैं ;मसलन -पाकिस्तान को अलग-थलग करने के अलावा यह सरकार और क्या हासिल कर पाई है; क्या ऐसा नहीं लगता कि संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ मित्रता निभाने की उत्कट अभिलाषा से भारतीय विदेश नीति असंतुलन के दौर से गुजर रही है; क्या ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा है कि चीन को प्रतिसंतुलित करने की नीति से भारतीय विदेश नीति स्वयं असंतुलन की नीति का शिकार हो गई है?

       2014 के बाद की विदेश नीति में यह देखा जा सकता है भारत अमेरिका को अपना स्वाभाविक मित्र बनाने की दिशा में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता है। उदाहरण के लिए भारत अमेरिका के बीच 2016 का लीमा ( Logistics Exchange Memorandum of Agreement) समझौता,  2018 का कॉमकासा ( The Communication Compatibility and Security Agreement) समझौता आदि जैसे महत्वपूर्ण सामरिक समझौता इसी दिशा की तरफ इशारा कर रहे हैं । इसी मित्रता को और गहरा बनाने के लिए ह्यूस्टन का ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम, गुजरात का ‘नमस्ते ट्रंप’ जैसे ग्लैमर शो का आयोजन भी किया गया। जिससे यह लगने लगा कि भारत तथा अमेरिका सदियों पुराने रिश्ते से बंधे हो।

      दक्षिणी चीन सागर में चीन का सामना करने के लिए ‘क्वाड एलायंस’ में भारत की भागीदारी; एशिया-पैसिफिक क्षेत्र को ट्रंप द्वारा इंडो- पेसिफिक क्षेत्र घोषित करना, इस बात की और भी पुष्टि करते हैं मानो भारत  और अमेरिका के हित स्वभावत: एक ही है।

      भारत, अमेरिका को अपना स्वाभाविक मित्र बनाने को आतुर है । इससे भारत को कम अमेरिका को ज्यादा फायदा होता दिख रहा है। सामरिक समझौतों के माध्यम से संयुक्त राज्य अमेरिका भारत को हथियार का एक बड़े  बाजार की तरह देख रहा है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि 2014 से 2018 में भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक देश रहा है (Stockholm International Peace Research Institute- SIPRI  रिपोर्ट, मार्च, 2019)। इस रिपोर्ट में यह बताया गया है कि अमेरिका भारत को हथियार निर्यात करने वाला विश्व का तीसरा सबसे बड़ा देश है। जाहिर है अमेरिका पहले स्थान पर काबिज होना चाहता है। जिसमें वह सफल होता दिख रहा है क्योंकि SIPRI के रिपोर्ट में यह सामने आया है कि भारत द्वारा रूस से आयात किए जाने वाले हथियारों में 24 फ़ीसदी की गिरावट आई है जबकि इसी दौर में अमेरिका की भागीदारी में इजाफा हुआ है।

        ट्रंप प्रशासन की नीति ‘अमेरिका पहले’ पर केंद्रित है जिसके अंतर्गत ट्रंप वे सभी उपाय करते दिख रहे हैं जिससे अमेरिकी हित को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाया जा सके। जून 2019 में ट्रंप ने भारत को अपने जीएसपी (Generalized System of Preferences)लिस्ट से बाहर करने की घोषणा ‘अमेरिका पहले’ की नीति का ही परिणाम है। यह ध्यातव्य है कि भारत जीएसपी से अत्यधिक लाभान्वित होता था जिस पर अब ग्रहण लग चुका है। ट्रंप वहीं नहीं रुके बल्कि ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाकर भारत- ईरान संबंध को भी खटाई में डाल चुके हैं। और तो और वह बार-बार वीजा नीति को सख्त बनाने की धमकी भी देते रहते हैं।

      ट्रंप की  इन्ही नीतियों की वजह से भारतीय विदेश नीति के समक्ष चुनौतियों के कई मोर्चे खुल गए हैं। उदाहरण के लिए यह देखा जा सकता है कि ईरान पर अमेरिका के आर्थिक प्रतिबंधों के दबाव में भारत का तेल आयात ईरान से लगभग शून्य पर आ चुका है। इन्हीं आर्थिक प्रतिबंधों के दबाव में भारत ईरान के साथ हुए महत्वपूर्ण समझौता चारबाहर- जाहेदन  रेल लाइन समझौता से ईरान ने भारत को बाहर कर दिया है। यह ध्यातव्य है कि यह परियोजना 628 किलोमीटर लंबी है जोकि ईरान के चारबहार बंदरगाह से अफगानिस्तान की सीमा पर लगे ज़ाहेदान तक जाती है। ईरान ने भारत को इस समझौते से बाहर करने का प्रमुख कारण भारत का इस समझौते में सक्रिय ना होना बताया है। जाहिर है इसकी प्रमुख वजह अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को माना जा रहा है।

       ईरान के साथ भारत का संबंध अत्यधिक पुराना है। चाबहार बंदरगाह तथा चारबाहर- जाहेदन रेल लाइन समझौता भारत की पैठ को मध्य एशिया तथा यूरोप में आसान बनाते हैं। पाकिस्तान को बाईपास करके भारत अफगानिस्तान में सीधी पहुंच इसी रास्ते से हासिल कर सकता है। इस परियोजना से भारत का दूर होना सामरिक एवं व्यापारिक (मध्य एशिया तथा यूरोप एक बड़ा बाजार भी है) दोनों तरह से नुकसान है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि चाबहार बंदरगाह पाकिस्तान में चीन द्वारा विकसित ग्वादर पोर्ट जोकि चीन का ‘स्ट्रिंग आफ पर्ल्स’ की नीति का ही एक हिस्सा है, का माकूल जवाब भी है।

      भारत की विदेश नीति दबाव से गुजर रही है जिसकी वजह से ईरान और चीन के नजदीक आता जा रहा है। अभी हाल ही में चीन ने ईरान के साथ 400 बिलियन डॉलर का 25 वर्षीय समझौता किया है जिसके तहत चीन चाबहार पोर्ट के आसपास बुनियादी संरचनाओं का विकास ,संपर्क ( Connectivity) तथा ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश करेगा। इस कारण से भारत के समक्ष दोहरी चुनौती उभरी है- एक तो चीन को प्रति संतुलित करना और दूसरा ईरान के साथ संबंधों को पटरी पर लाना।

      अफगानिस्तान के तालिबानियों के  साथ संयुक्त राज्य अमेरिका ने दोहा में एक शांति समझौता (February 2020) किया जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका के तरफ से विशेष प्रतिनिधि जालमें खालिल्जाद तथा तालिबानियों के नेता मुल्लाह अब्दुल गनी बरादर शामिल हुए। ऐतिहासिक शांति समझौता कहे जाने वाले इस समझौते के तहत संयुक्त राज्य अमेरिका एवं नाटो सेनाएं मई 2021 तक अफगानिस्तान से बाहर हो जाएंगी। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस समझौते में वर्तमान अफगानिस्तान की सरकार भागीदार नहीं थी। भारत इस समझौते को लेकर असमंजस की स्थिति में है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने अफगानिस्तान में भारतीय हितों को नजरअंदाज किया है। यदि अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार आती है तो भारतीय विदेश नीति के समक्ष अफगानिस्तान भी एक चुनौती पेश करेगा। संभावना यह भी जताई जा रही है कि तालिबानी लड़ाके जम्मू कश्मीर को अस्थिर कर सकते हैं।

     भारत का अमेरिका के साथ बढ़ती नजदीकी हमारे उत्तर के महत्वपूर्ण पड़ोसी देश चीन को भी रास नहीं आ रहा है। इसी नजदीकी को संतुलित करने के लिए चीन ने भारत के समक्ष कई मोर्चे खोल रखे हैं। 15 जुलाई 2020 को लद्दाख में गलवान घाटी की हिंसक झड़प इसी का ज्वलन्त  उदाहरण है। ध्यातव्य है की गलवान घाटी का यह क्षेत्र भारत तथा चीन के बीच कभी भी विवाद का विषय नहीं रहा है। इस विषय पर फुदान विश्वविद्यालय, चीन के भारत-चीन संबंधों के एक्सपोर्ट लीन मिंगवांग तथा संघाई इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज  के एक्सपर्ट ली होंगमी का मानना है की गलवान घाटी का संघर्ष ‘दुर्घटना’ नहीं है बल्कि ‘अपरिहार्य परिणाम’ (inevitable result )है। ( The Hindu , दिनांक 15 जुलाई 2020 पेज नंबर – 6) । इन एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत और  अमेरिका एक ‘ अर्द्ध – सहयोगी’ हैं जिसे रिवर्स नहीं किया जा सकता। जाहिर है भारत का अमेरिका के साथ नजदीकी चीन को उकसा रही है एवं एक नई चुनौती बनकर उभर रही है।

      चीन ने भूटान के पूर्वी हिस्से में स्थित ‘ साक्तेंग राष्ट्रीय पार्क’ को दी जाने वाली निधि जोकि ग्लोबल एनवायरमेंट फैसिलिटी (GEF) द्वारा दी जाती है, पर आपत्ति जताई एवं इसे विवादित क्षेत्र का हिस्सा माना। पूर्वी भूटान का यह क्षेत्र चीन तथा भूटान के बीच कभी भी विवाद का हिस्सा नहीं रहा है। स्पष्ट है चीन भारत के समक्ष एक नया मोर्चा खोलने की फिराक में है। पूर्वी भूटान का क्षेत्र  अरुणाचल प्रदेश के पश्चिमी जिले तवांग से लगा है। यह भी ध्यान रखना है कि चीन अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत का हिस्सा मानता आया  है। जून 2017 में भारत और चीन की सेना भूटान, भारत और चीन के ट्रायंगल क्षेत्र में स्थित दो कलाम में आमने सामने आ गई थी जिसे लम्बी वार्ता के बाद ही टाला जा सका था |

     नेपाल हमारा सदाबहार मित्र रहा है। सांस्कृतिक और भौगोलिक निकटता हमारे संबंधों को और भी गहरा बनाते हैं। लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि  नेपाल में वर्तमान के. पी. शर्मा ओली की सरकार चीन से प्रभावित है । हाल ही में नेपाल ने अपने देश का एक नया नक्शा जारी किया जिसमें भारत से लगे हुए प्रदेश उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के लिमहियाद्युरा, लिपुलेख और कालापानी को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया है। जबकि भारत और नेपाल के बीच हुए सुगौली संधि-१८१६  के तहत ये सभी क्षेत्र भारत के हिस्से  माने गए हैं। यद्यपि यह सत्य है कि नेपाल की वर्तमान सरकार राष्ट्रवाद की लहर पर सवार है लेकिन चीनी प्रभुत्व का नेपाल में बढ़ना भी सत्य प्रतीत होता है ।

    एनडीए सरकार की अमेरिका के साथ मित्रता की लालसा ने हमारे सबसे भरोसेमंद मित्र रूस को पाकिस्तान और चीन के करीब लाया है। इसको रूस तथा पाकिस्तान के बीच होने वाले ‘फ्रेंडशिप ड्रिल’ सैन्य अभ्यास(२०१६) के उदाहरण से समझा जा सकता है। यह वही समय था जब पाकिस्तान  प्रायोजित आतंकवादियों ने पठानकोट एयर बेस तथा ऊरी के आर्मी कैंप पर हमला किया था। यह भी ध्यान देना रोचक है कि पाकिस्तान के साथ रूस का यह पहला सैन्य अभ्यास है। इतना ही नहीं चीन तथा रूस ने दिसंबर 2019 को गैस पाइपलाइन समझौता किया जिसकी लागत लगभग 400 बिलियन डॉलर  है।

       उपर्युक्त दृष्टान्तों से जाहिर है मोदी सरकार की विदेश नीति असंतुलन के दौर में है। इस असंतुलन की प्रमुख वजह यद्यपि कई हैं लेकिन प्रमुख वजह अमेरिका की तरफ अत्यधिक झुकाव तथा चीन के प्रति शत्रुता पूर्ण आग्रह  है। इस असंतुलन को संतुलित करने के लिए मोदी सरकार को बहुआयामी रणनीतियों तथा नीतियों के साथ आगे बढ़ना होगा। मसलन अमेरिका के साथ-साथ चीन एवं अन्य पड़ोसी देशों को भी समान महत्व प्रदान करना होगा। सरकार को यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘पड़ोसी का कोई विकल्प नहीं होता है’। हम अपने अर्थव्यवस्था को बदल सकते हैं लेकिन भूगोल को नहीं ।

       मोदी सरकार को चाहिए कि दक्षिणी चीन सागर पर ज्यादा फोकस करने की बजाय हिंद महासागर पर ध्यान दें। हिंद महासागर की रणनीतिक भूमिका दक्षिणी चीन सागर की अपेक्षा  भारत के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। भारत को पड़ोसी देशों में यथा नेपाल,श्रीलंका,बांग्लादेश में संचालित किए जाने वाली परियोजनाओं में आ रही ‘डिलीवरी डेफिसिट’ को कम करना होगा। कम समय में गुणवत्ता युक्त परियोजनाओं को पूरा करके पड़ोसी राज्यों को सुपुर्द करना चाहिए। इससे न केवल भारत की साख बढ़ेगी वरन् वित्तीय अपव्यय में भी कमी आएगी। कहने का आशय यह है कि ‘पड़ोसी पहले’ की नीति केवल सिद्धांत नहीं व्यवहार में भी आना चाहिए।

       ईरान के साथ संबंधों को पटरी पर लाने का प्रयास बिना किसी दबाव के करना होगा। चारबाहर – जाहेदान रेल लाइन समझौता में भारत को पुनः अपनी रुचि बढ़ानी होगी। इस समझौते से व्यापारिक हितों के साथ-साथ सामरिक हितों को बढ़ावा मिलेगा। मध्य पूर्व खासकर अफगानिस्तान तथा यूरोप तक पहुंच आसान होगी |ईरान के माध्यम से भारत के लिए मध्य एशिया तथा यूरोप में एक बड़े बाजार का रास्ता खुल सकता है। सार्क तथा बिम्सटेक जैसे क्षेत्रीय संगठन औपचारिक बनकर रह गए हैं। इन संगठनों को पुनः चलायमान करने की दिशा में सरकार को जिम्मेदारी पूर्वक आगे आना चाहिए ताकि पड़ोसी देशों के बीच संचार की निरंतरता बनी रहे।

       यद्यपि चीन की विदेश नीति हमेशा से परिवर्तनशील रही है फिर भी भारत को चीन को सकारात्मक संदेश देना वर्तमान वक्त की दरकार है। चीन को या समझाना होगा कि भारत शत्रु नहीं बल्कि एक अवसर है। इस क्रम में भारत को ‘यथार्थवादी‘ तथा ‘आदर्शवादी’ विदेश नीति के सम्मिश्रण तथा संतुलन के साथ आगे बढ़ना होगा। यथार्थवादी दृष्टि  की अगर बात करें तो भारत को सैनिक मोर्चे पर मजबूती से आगे बढ़ना होगा एवं चीनी सीमाओं से लगे क्षेत्रों में संरचनात्मक विकास पर गंभीरता से ध्यान देना होगा। आदर्शवादी विचारधारा की अगर बात करें तो चीन को भारत को यह बताना होगा कि वे एशिया के दो सबसे बड़ी शक्तियां हैं। व्यापारिक दृष्टि से चीन और भारत एक दूसरे का लाभ उठा सकते हैं। यह भी ध्यान रखना है कि चीन के नकारात्मक रवैया के कारण ही भारत  न्यूक्लियर  सप्लायर ग्रुप (NSG) का सदस्य नहीं बन पा रहा है। यदि चीन के साथ संबंध सुधरेंगे तो न केवल इस दिशा में बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे।

     इन सब बातों के अलावा यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत अमेरिका के साथ व्यापार आधिक्य की स्थिति में है। 2019-20 के वित्तीय वर्ष में अमेरिका भारत में चौथा सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेशक देश रहा है।

अतः अमेरिका को भी उसके हक का वाजिब लाभ मिलना चाहिए। लेकिन इस लाभ की भरपाई इतना अधिक ना हो कि हमारे राष्ट्रीय हितों को ही नुकसान होने लगे। भारत अमेरिका के लिए बड़ा बाजार होने के साथ-साथ एशिया में एक बड़ी शक्ति भी है।अमेरिका को भारत की जरूरत है इसलिए भारत अमेरिका के साथ अपने राष्ट्रीय हितों को संरक्षित करने के लिए कुछ हद तक सौदेबाजी कर सकता है।

सन्दर्भ –

  1. फुदान विश्वविद्यालय, चीन के भारत-चीन संबंधों के एक्सपोर्ट लीन मिंगवांग तथा संघाई इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज  के एक्सपर्ट ली होंगमी। ( The Hindu , दिनांक 15 जुलाई 2020 पेज नंबर – 6)
  2. (Stockholm International Peace Research Institute- SIPRI  रिपोर्ट, मार्च, 2019)।

नरेन्द्र नारायण पाण्डेय ने अपनी शिक्षा दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय से प्राप्त की है। UGC नेट २०१८ में राजनीतिशास्त्र में उत्तीर्ण किया ।अंतर्राष्ट्रीय संबंधो तथा भारतीय राजनितिक व्यवस्था जैसे विषयों पर रूचि है।

नरेन्द्र नारायण पाण्डेय

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