Share

बिहार की शिक्षा व्यवस्था-प्रियंका कुमारी

बिहार प्राचीन काल से ही शिक्षा की भूमि रही है।अपने शैक्षिक योगदान के कारण वह भारत ही नहीं बल्कि विश्व में अग्रणी रहा है।गुप्त काल में स्थापित नालंदा विश्विद्यालय में देश-विदेश से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे।पाल वंश के शासकों ने विक्रमशिला और ओदंतपुरी विश्वविद्यालय की स्थापना कर बिहार की समृद्ध शिक्षा परम्परा को आगे ले जाने का कार्य किया ।शिक्षा की यह समृद्ध परम्परा बख्तियार खिलज़ी के नालंदा आक्रमण के बाद से बिहार में धूमिल पडने लगी।ये विश्वविद्यालय बौद्ध दर्शन एवं शिक्षा के महत्त्वपूर्ण केंद्र थे ।विदेशी आक्रमण के साथ धर्म और जाति की राजनीति ने भी बिहार में शिक्षा का स्तर कम किया।बिहार में शिक्षा की समृद्ध परम्परा का लगातार ह्रास हुआ है और यह आज भी बदस्तूर जारी है।

किसी भी विकासशील देश या राज्य में सबसे अधिक सुधार की जरूरत शिक्षा क्षेत्र में होती है ।इसके लिए दीर्घकालीन योजनाओं के साथ अल्पकालीन योजनाओं की भी आवश्यकता होती है । तब जाकर कालांतर में शिक्षा क्षेत्र से बेहतर परिणाम देखने को मिलते हैं।

बिहार की शिक्षा व्यवस्था कैसी है ?जैसी है वैसी क्यों है ? इसमें सुधार की कितनी गुंजाईश है ? ऐसे प्रश्नों के सापेक्ष में बिहार की शिक्षा व्यवस्था को समझने का प्रयास किया जा सकता है। बिहार की शिक्षा व्यवस्था का आकलन देश की स्वतंत्रता के बाद से करें तो स्वतंत्र भारत में प्रथम जनगणना के अनुसार भारत की कुल साक्षरता दर 18.33% थी तो बिहार की साक्षरता दर 13.49% थी।उस समय बिहार से कम साक्षरता दर वाले राज्यों में राजस्थान, उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश शामिल थे, जिनका साक्षरता दर क्रमशः 8.5%, 12.02% एवं 13.16% था।भारत की जनगणना 2011 के अनुसार राजस्थान, उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश की साक्षरता दर क्रमशः 67.06%, 69.72% एवं 70.63% है, जबकि बिहार की साक्षरता की दर 63.82% है जो भारत की साक्षरता दर 74.04% से बहुत कम है साथ ही जो राज्य स्वतंत्रता प्राप्त करने के समय बिहार से पीछे थे,अब उनकी  साक्षरता दर बिहार से अधिक हो गयी है।जिससे स्पष्ट होता है कि बिहार में शिक्षा के क्षेत्र में देश में सबसे कम सुधार हुआ है।

बिहार राज्य की शिक्षा  व्यवस्था के सबसे पिछड़ा होने के बहुत से कारण हैं  जिसमें यहाँ की सामाजिक संरचना की बहुत बड़ी भूमिका है।बिहार सामाजिक रूप से पिछड़ा हुआ राज्य है, यह ऐसा राज्य है जहाँ देश के अन्य राज्यों की तरह जातिवाद का जहर शिक्षा व्यवस्था को बहुत दिनों तक डंसता रहा । देश के गणतंत्र होते ही देश के सभी नागरिक को हर क्षेत्र में समान अधिकार दिए गए हैं, लेकिन देश के समाज का बहुत बड़ा तबका समान अधिकार पाने के लिए आज तक संघर्ष कर रहा है । गरीब, लाचार विद्यार्थी जब पहले स्कूल में जाता था तब उसके जाति के द्वारा उसकी पहचान करके उसके साथ व्यवहार करना बिहार में बहुत आम बात थी ।यह अमूमन बिहार के लगभग सभी जगह  सन् 1990 तक होता रहा।सन् 1990 से इन सब चीजों में बहुत हद तक लगाम लगा । चरवाहा विद्यालय में बहुत सारी खामियां रही हैं, लेकिन इस विद्यालय के द्वारा समाज के गरीब विद्यार्थी जो अपना काम करते हुए पढ़ना चाहते थे (कृषि कार्य, गृह कार्य, मेहनत, मजदूरी) उनको आगे बढ़ने का नया रास्ता मिला । अब समाज में हर वर्ग के विद्यार्थी की उपस्थिति विद्यालय में सुचारू रूप में होने लगी थी ।

सन् 1991 में भारत में ‘नई आर्थिक नीति’ का प्रभाव पूरे देश के साथ बिहार पर भी पड़ा । निजीकरण के कारण बिहार में निजी स्कूल कुकुरमुत्ते की तरह उग आएं । जिसमें सरकारी स्कूल की अपेक्षा निजी स्कूलों में पढ़ाई के साथ अन्य रचनात्मक कार्यों की उत्तम व्यवस्था का दावा किया गया । फलस्वरूप पैसे वाले अभिभावक अपने बच्चे का दाखिला निजी स्कूल में कराने लगे । इसके बाद सरकारी स्कूल की शिक्षा व्यवस्था चरमराने लगी और निजी प्राइवेट स्कूल लाभ कमाने लगें ।जब सरकारी स्कूल कमजोर, गरीब और लाचार विद्यार्थियों के लिए रह गया तब सरकारी शिक्षक भी बेमन से शिक्षण कार्य करने लगे।जिसका बड़ा कारण उनके स्वयं के बच्चों के साथ समाज के उच्च वर्गों के विद्यार्थी का प्राइवेट स्कूल में पढ़ना था।अब सरकारी स्कूल के बच्चे उनके लिए ऐसे बोझ के समान थे, जिसके पढ़ने न पढ़ने से उनका सरोकार न के बराबर रह गया । निजी स्कूल की तरह ही बिहार में कोचिंग संस्थान भी अस्तित्व में आ गये । अब विद्यार्थी अपने हैसियत के अनुसार कोचिंग संस्था में शिक्षा ग्रहण करने लगे।

राज्य में बढ़ते शिक्षा संस्थानों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे बिहार शिक्षा के क्षेत्र में बहुत विकास कर रहा है । लेकिन जमीनी आंकड़ा ठीक इसके विपरीत है । बिहार में सरकारी स्कूलों में जितनी वृद्धि हुई, उससे कहीं ज्यादा निजी स्कूलों एवं कोचिंग संस्था में वृद्धि हुई है । बिहार में शिक्षा संस्थान में बढ़ोत्तरी तो हुई, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता पर किसी ने भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया । शिक्षा जैसे महान कार्य को व्यापार बना दिया गया । आज स्कूल के साथ कोचिंग संस्था में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में अपने ऊपर इतना भी भरोसा नहीं है कि वह परीक्षा में बिना नकल के लिख सकता है। ऐसा नहीं है कि सभी विद्यार्थी ऐसे हैं, लेकिन बिहार में पढ़ने वाले अधिकतर विद्यार्थी ऐसे ही हैं और इस परिस्थिति के लिए पूरी शिक्षा व्यवस्था जिम्मेदार है।विद्यार्थी,अभिभावक,स्कूल, परीक्षा व्यवस्था सभी इसके लिए बराबर के दोषी हैं।बिहार में ‘नो डिटेनशन पालिसी’ के कारण बच्चे को आठवीं तक  फेल नहीं किया जा सकता।आगे मैट्रिक, इंटर, स्नातक और आगे की परीक्षा नक़ल से पास किया जाता है । इसका प्रमाण बिहार बोर्ड के कई सालों के टॉपर की मीडिया में फजीहत से भी पता चलता है।टॉपर विद्यार्थी किसी भी प्रश्न का जबाब नहीं दे पाता,चाहे वह किसी भी संकाय या किसी भी वर्ग का टॉपर रहा हो। हद तो बिहार बोर्ड ने तब कर दी जब उसने नीट टॉपर को बिहार बोर्ड का टॉपर बना दिया, जिसने पहले ही बता दिया था कि वह कोटा में रहकर नीट की तैयारी कर रही थी। विवाद होने पर बिहार बोर्ड को सफाई देनी पड़ी कि बिहार में अटेंडेंस अनिवार्य नहीं है । ऐसी शिक्षा व्यवस्था के बारे क्या कहेंगे जहाँ अटेंडेंस ही अनिवार्य नहीं है । इसके बाद भी अगर आप पास नहीं हुए तो बिहार में फर्जी सर्टिफिकेट बनाए जाने का कारोबार चलता है।मतलब यहाँ सभी आप्शन खुले हैं । 

बिहार के स्कूलों में विद्यार्थियों की उपस्थिति की संख्या धीरे धीरे अच्छी होने लगी है लेकिन उच्च शिक्षा की स्थिति बहुत ख़राब है,महाविद्यालय में विद्यार्थियों के आने का चलन ही नहीं हैम ऐसी स्थिति सिर्फ सरकारी महाविद्यालय की ही नहीं बल्कि प्राइवेट महाविद्यालय की भी है ।बहुत कम विद्यार्थी ही महाविद्यालय आते हैं, जिनमें पढ़ने एवं आगे बढ़ने की ललक है।महाविद्यालय में अधिकतर विद्यार्थी सिर्फ परीक्षा देने आते हैं, अगर उनके बदले किसी और को परीक्षा देने की अनुमति होती तो शायद बहुत से विद्यार्थी यह भी जहमत नहीं उठाते । विश्विद्यालय के प्राध्यापक विद्यार्थी के इंतज़ार में कार्यालीय कार्य करने को मजबूर हैं । 75% अटेंडेंस के बावजूद भी 0 % अटेंडेंस होने पर भी विद्यार्थी को परीक्षा देने से नहीं रोका जा सकता । न ही ऐसे उपाय किए जाते हैं जिससे विद्यार्थी महाविद्यालय आयें । शिक्षा में सुधार का काम सिर्फ कागज पर होता है, ज़मीन पर नहीं । इस वजह से विद्यार्थी सिर्फ नाम के लिए डिग्री प्राप्त करते  हैं, जिसके वे वास्तव में हकदार ही नहीं होते ।

बिहार की ऐसी शिक्षा व्यवस्था की वजह से बिहार का योग्य विद्यार्थी हमेशा पिसता रहता है । दूसरी तरफ पैसा, रूतबा एवं नक़ल के बल पर अयोग्य विद्यार्थी पास ही नहीं होता बल्कि टॉप कर जाता है । बिहार में अभी भी योग्य शिक्षक और विद्यार्थी की कमी नहीं है । जरूरी यह है कि शिक्षक के साथ पूरा समाज विशेषकर शिक्षा प्रशासन में बैठे लोग शिक्षा की गंभीरता को समझे, ताकि सरकार अपनी शिक्षा नीति का पालन अच्छे से और ज़मीन पर करवा सके । बिहार के विद्यार्थी होनहार होते हैं, जो कड़ी मेहनत करने वाले हैं, उनमें आगे बढ़ने का लगन और जज्बा दोनों है ।इसलिए जरूरी है कि गर्त में चले गये बिहार की शिक्षा व्यवस्था को उबारने का प्रयास किया जाए । साथ ही साथ शिक्षा संसाधन का समुचित और उचित प्रयोग करना भी आवश्यक है । अगर बिहार की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त कर फिर से सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया जाएगा तभी बिहार के साथ साथ देश भी तरक्की के मार्ग पर प्रशस्त होगा।

प्रियंका कुमारी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली से उच्च शिक्षा प्राप्त किया है। वर्तमान में जयप्रकाश नारायण विश्वविद्यालय छपरा में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।

प्रियंका कुमारी

RELATED ARTICLES

सिताब दियारा से सम्पूर्ण क्रांति तक की यात्रा ने जय प्रकाश को ‘लोकनायक’ बनाया-डॉ. रजनीश कुमार यादव

Share

Shareलोकनायक और जेपी के नाम से प्रसिद्ध जय प्रकाश नारायण महान स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और…

Leave a Reply

Your email address will not be published.