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आज से 30 साल पहले जब गांधी रूपये के नोटों पर न थे. तब के अपने बचपन में हमने गांधी को देखा और पढ़ा कम;सुना ही ज्यादा था. सुना था लोगों की उन बातों में जो अक्सर 2 अक्टूबर के दिन स्कूलों में होती थी. पर वह सुनना भी कोई सुनना था; बच्चों का सारा ध्यान तो इस दिन की बहस के अंत में मिलने वाले उन चार छह बतासों पर लगा रहता था. जिनकी मिठास स्कूलों में साल के सिर्फ तीन दिन ही हमारे स्वाद का हिस्सा बनती थी. पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी के बाद दो अक्टूबर ही वह तीसरा दिन हुआ करता था. जिसे बाद में हमने गांधी जयंती के रूप में जाना. इसके पहले भी अपने परिवेश के साथ बच्चों के जेहन में अलग-अलग गांधी जी का एक बिंब बनता था क्षेत्रीय गांधी गीतों के जरिये. जहां सोहर,कजरी और विवाह के गीतों में गांधी की झलक आसानी से घुली रहती थी. बड़े ही लयात्मक अंदाज में बच्चों के जेहन में गांधी उन गीतों के जरिये निर्मित होते थे. अवध के क्षेत्र में गाया जाने वाला यह गीत इसका एक उदाहरण है- मोरे चरखे का टूटे न तार../चरखवा चालू रहे…/गांधी महात्मा दूल्हे बने हैं/ दुल्हन बनी सरकार/चरखवा चालू रहे…इस तरह के गांधी गीतों की व्याप्ति भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रही है

स्कूल की किताबों में सोहनलाल द्विवेदी की कविता ‘हम सबके थे प्यारे बापू’ ही वह पहली कविता थी जिसके जरिये गांधी किताब के पन्नों में पहली बार मिले थे.इस कविता का लय और इसकी तुकांतता हमें इतनी भा गयी थी कि बाद के दिनों में भी यह गीत हमारे साथ बना रहा.हम इसे गाते थे,गुनगुनाते थे. उस समय स्कूल में होने वाली होने वाली कई अन्त्याक्षरी प्रतियोगिताओं में हम इस कविता की लाइनों को तुरुप के पत्तों के मानिंद उपयोग करते थे और फिर सामने वाले के लिए ‘प’वर्ग से कविताओं को ढूढ़ना मुश्किल हो जाता था.हमारे बचपन के गांधी यही थे. बच्चों के बीच गांधी की लोकप्रियता स्कूली दायरे के साथ ही साथ उनके अपने समाज में भी खूब बनी हुयी है. जिस तरह से गांधी का बच्चों पर अटूट विश्वास था गांधी अपनी सहजता और सरलता के चलते बच्चों को आज भी आकर्षित करते हैं.

महात्मा गांधी बच्चों के बारे में क्या सोचते थे इसे जब गांधी को पढ़ा तब जान पाया.बच्चों में आत्मसम्मान की सूक्ष्म अनुभूति होती है इस बात को मानते हुए महात्मा गांधी ने जीवन भर बच्चों पर पूरा यकीन रखा और अपने लेखन में यह दर्ज किया है कि ‘एक नये समाज के निर्माण के लिए बच्चों के इस समृद्ध संसार के अनुभवों के साथ बहुत कुछ सीखा जा सकता है.’ उनका विचार था कि बच्चों से कुछ सीखने के लिए बड़ों में विनम्रता का होना बहुत जरूरी है. इतना ही नहीं बच्चों की तथाकथित बदमाशी को लेकर किये जाने वाले अभिभावकीय शोर के बजाय गांधी माता-पिता को बच्चों के प्रति अपने व्यवहार ठीक करने की सलाह देते हैं. समाज बच्चों के साथ कैसे परवरिश करे और उनके साथ किस तरह के संवाद का रिश्ता कायम हो?इस पर 19 नवम्बर 1931 को यंग इंडिया में लिखा कि ‘मुझे पूरी विनम्रता के साथ इस सच्चाई को मानना होगा कि मैं अपने अस्तित्व के प्रत्येक तंतु में प्रेम कि झलक पैदा करने का प्रयास करता हूँ,भले ही मैं इसे कितने ही तटस्थ भाव से करूं. मैं अपने सिरजनहार की,जो सत्य स्वरुप है,उपस्थिति का अनुभव करने के लिए अधीर हूँ,और मैंने अपने जीवन के आरंभिक वर्षों में ही जान लिया था कि अगर मुझे सत्य को पाना है तो मुझे अपनी जान की परवाह न करते हुए प्रेम के नियम का पालन करना चाहिए.प्रभुकृपा से जब मुझे संतान की प्राप्ति हुई तो मैंने पाया कि प्रेम के नियम को छोटे बच्चों के द्वारा ही सबसे अच्छी तरह समझा और सीखा जा सकता है. मैं निर्विवाद रूप से इसमें विश्वास करता हूँ कि कोई बच्चा बदमाशी की वृत्ति लेकर पैदा नहीं होता. यदि बच्चे के जन्म से पहले और उसके उपरान्त,जब वह बढ़ रहा हो,उसके माता-पिता उसके साथ ठीक से व्यवहार करें तो यह सुविदित तथ्य है कि बच्चा सहज रूप में सत्य के नियम और प्रेम के नियम का पालन करने लगेगा. वे लिखते हैं कि अपने जीवन के आरंभिक वर्षों में जब मैंने यह सबक सीखा तो जीवन में धीरे-धीरे किन्तु एक निश्चित परिवर्तन आने लगा .’

गांधी ने बचपन और बच्चों की दुनिया को जिस सहजता के साथ देखा है उसमें बच्चों की दुनिया की सर्जनात्मकता पर गांधी का पूरा यकीन झलकता है.बच्चों के साथ के किये गए अपने अनुभवों को दर्ज करते हुए गांधी इस बात पर अडिग हैं कि ‘विश्वास कीजिए, मैं सैकड़ों नहीं हजारों बच्चों के निजी अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ कि हमारी अपेक्षा बच्चों में आत्मसम्मान की बड़ी सूक्ष्म अनुभूति होती है. अगर हममें विनम्रता हो तो हम जीवन के महानतम पाठ तथाकथित अबोध बच्चों से सीख सकते हैं, उनके लिए बड़ी उमर के विद्वानों के पास जाने की आवश्यकता नहीं है.

गांधी का बचपन भी बालमन के उन प्रयोगों से अछूता नहीं है जिसमें बच्चे हर एक चीज का खिलौना बना लेते हैं.स्कूल के शुरूआती दिनों में अपने शिक्षकों का साथियों के बीच में मज़ाक बनाने की बाल सुलभ चेष्टा अपनी कक्षा के शर्मीले मोहनदास में भी थी. ‘सत्य के प्रयोग’ में अपने बचपन का जिक्र करते हुए गांधी इस बात को बताते हैं कि किस तरह स्कूल के शुरूआती दिनों में वे अपने साथियों के साथ विद्यालय और शिक्षक का बखूबी बाल सुलभ मजाक बनाया करते थे. वे लिखते हैं – ‘बचपन मेरा पोरबंदर में बीता.याद पड़ता है कि मुझे किसी पाठशाला में भरती किया गया था.मुश्किल से थोड़े पहाड़े मैं सीखा था.मुझे सिर्फ इतना याद है कि मैं उस समय दूसरे लड़कों के साथ अपने शिक्षक को गाली देना सीखा था.और कुछ याद नहीं पड़ता.इस परसे मैं अंदाज लगाता हूँ कि मेरी बुद्धि मंद रही होगी;और स्मरण-शक्ति उन पंक्तियों के कच्चे पापड़-जैसी होगी,जिन्हें हम बालक गाया करते थे. वे पंक्तियाँ मुझे यहाँ देनी ही चाहिए.एकड़े एक,पापड शेक;/पापड कच्चो,–मारो–पहली खाली जगह में मास्टर का नाम होता था.उसे मैं अमर करना नहीं चाहता.दूसरी खाली जगह में छोड़ी हुई गाली रहती थी, जिसे भरने की आवश्यकता नहीं.’

वे मानते थे कि स्कूली शिक्षा में बचपन को गुम नहीं करना चाहिए बल्कि उन्हें अपने आस-पास के परिवेश के प्रति जागरुक करते हुए सहजता के साथ विद्यालय में उनके अपने स्वभावगत चीजों की जगह बनानी चाहिए. बच्चों की पढ़ाई और तालीम ऐसी हो जिसका उपयोग भावी जीवन के व्यवहार में हो सके. स्कूल की पढ़ाई भविष्य की अमूर्तता में झोंक देने के पक्षधर वे नहीं थे.अपने लेखों और भाषणों में वे हमेशा अभिभावकों को अपने बच्चों को शिक्षा के अवसर देने की बात करते हैं. 17 अक्टूबर 1929 को यंग इंडिया में गांधी जी लिखते हैं कि –‘कोई पिता अपने सभी बच्चों को यदि कोई वास्तविक संपत्ति बराबर-बराबर हस्तांतरित कर सकता है तो वह उसका चरित्र और शैक्षिक सुविधाएं. माता-पिता को चाहिए कि अपने बच्चों को आत्मनिर्भर बनाएं ताकि वे शारीरिक श्रम के द्वारा ईमानदारी से जीविकोपार्जन के योग्य बन सकें.ईसा ने इससे उंचे और महान सत्य की बात कोई नहीं कही कि ज्ञान की बातें भोले-भले बच्चों के मुंह से फूटती हैं.मैं इससे पूरी तरह सहमत हूं. मैंने अपने अनुभव में यह बात पाई है कि अगर हम विनम्रता और भोलेपन के साथ बच्चों से बात करें तो उनसे ज्ञान का पाठ पढ़ सकते हैं.’

बचपन भविष्य का द्वार होता है.पर केवल भावी जीवन की तैयारी तक बचपन को सीमित कर देना दरअसल बचपन के प्रति की जाने वाली एक तरह की हिंसा भी है.गांधी इस तरह की हिंसा के विरोधी थे. किसी बच्चे को बचपन में मिलने वाली सहजता और व्यवहारिकता का ज्ञान पूरे सामाजिक जीवन की गतिशीलता को प्रभावित करने वाला होता है. गांधी जिस वैश्विक समाज की परिकल्पना कर रहे थे उसमें मानवता की मिशाल के रूप में उन्होंने ‘सत्य’ और ‘अहिंसा’ जैसे दो टूल्स दिए. जिनके जरिये उन्होंने अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन की यथार्थ स्थितियों के साथ अपने प्रयोग किये. इस प्रयोग को ही वे अपने लेखन में ‘सत्य से साथ मेरे प्रयोग’ की संज्ञा देते हैं. कहना न होगा कि गांधी अपने पूरे सामाजिक-राजनीतिक जीवन में इन दो पैमानों के सहारे सबको इस बात पर सहमत करने में सफल रहे कि विश्व शान्ति का रास्ता इन दो मूल्यों को जीवन में उतारने के साथ ही निकल सकता है.

बच्चे की पहचान ही उसकी प्रयोगशीलता से होती है. बच्चा दुनिया की हर चीज के साथ प्रयोग करता है. गांधी ने जीवन भर अपने इन दो पैमानों पर जिन्दगी को देखने की जिद ठान रखी थी. बच्चों के दो अनिवार्य गुण ‘जिद’ और ‘प्रयोग’ गांधी के व्यक्तित्व के अनिवार्य अंग बनकर सामने आते हैं. अपने व्यक्तिगत जीवन से सार्वजनिक जीवन तक की यात्रा में वे कभी भी इनसे विलग नहीं होते हैं. उन्होंने इस बात को स्वीकार किया है कि ‘यदि हमें संसार में सच्ची शांति प्राप्त करनी है और युध्द के खिलाफ़ सच्ची लड़ाई लड़नी है तो हमें बच्चों से शुरुआत करनी होगी; और अगर बच्चे अपने सहज भोले-भले रूप में बड़े हो सकें तो न हमें संघर्ष करना पड़ेगा और न व्यर्थ के प्रस्ताव पास करने पड़ेगें. तब हम एक प्रेम से दूसरे प्रेम और एक शांति से दूसरी शांति तक बढ़ते चलें जाएंगें, यहाँ तक कि विश्व में सर्वत्र शांति और प्रेम का साम्राज्य छा जायेगा जिसके लिए आज सारी दुनिया तरस रही है.’

(लेखक एन.सी.ई.आर.टी. में प्रोजेक्ट फेलो रहे हैं और वर्तमान में इलाहाबाद विश्विद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.)

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