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नई शिक्षा नीति-2020 : चुनौतियां और संभावनाएं-डॉ. रजनीश कुमार यादव

किसी भी देश की नई शिक्षा नीति यह बताती है कि वहां के सरकार की नजर में शिक्षा की महत्ता कितनी है। वह इससे कितना सरोकार रखती है। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर के बेहतर गुणवत्ता वाले विश्वविद्यालयों में भारत के पिछड़ने के बाद यह उम्मीद की जाती है कि सरकार और समूची व्यवस्था सुधार के मामले में ठोस पहल करेगी, ताकि इस स्थिति में सुधार हो सके। ऐसे में केंद्रीय कैबिनेट द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को मंजूरी देने को आशा भरी नजरों से देखा जा रहा है ।यह इस मायने में भी सुखद पहल है कि लगभग 34 वर्षों बाद इसमें बदलाव देखने को मिल रहा है। उल्लेखनीय है कि 1968 और 1986 के (1992 में थोड़े संशोधन) बाद यह तीसरी राष्ट्रीय शिक्षा नीति होगी। जिसका प्रारूप 2019 में ही तैयार कर लिया गया था। इसरो के प्रमुख रह चुके डॉ के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में 2017 में इस समिति का गठन किया गया था। सरकार ने इस समिति के प्रस्ताव को मंजूरी देकर स्कूल समेत उच्च शिक्षा के व्यवस्था में परिवर्तन की राह को स्वीकृति दे दी है ।साथ ही एमएचआरडी का नया नाम शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया है ।इसका लक्ष्य शिक्षा और सीखने की प्रवृति की ओर पुनः ध्यान आकर्षित करना है। ऐसे में यह जानना समझना जरूरी है कि सरकार शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाने के लिए क्या-क्या नीतियां लेकर आई है। पहले की शिक्षा नीतियों के मुताबिक नया प्रारूप क्या होगा। इस पर सबकी निगाहें टिकी हैं। साथ ही इस नई शिक्षा नीति को लेकर आलोचना एवं विरोध भी शुरू हो गया है।शिक्षाविद और विशेषज्ञ कई तरह की कमियों की तरफ संकेत कर रहे हैं ।परिणामस्वरूप इस नई शिक्षा नीति के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर चर्चा करना आवश्यक है।

स्कूली शिक्षा में बदलाव
स्कूली शिक्षा मेंजो बदलाव हुआ है उसमें 10+2 फॉर्मेट की जगह 5 + 3 +3 +4 फॉर्मेट ने ले लिया है ।जिसमें क्रमशः 3-8 वर्ष,8 -11 वर्ष ,11-14 वर्ष और 14 -18 वर्ष की आयु तक के बच्चे हैं।पहले 3 सालों में पढ़ाई आंगनबाड़ी में होगी। इसके बाद बच्चे स्कूल में जाएंगे। फिर इन 5 सालों के लिए एक नया पाठ्यक्रम तैयार होगा। इसके जरिए प्रयोग के माध्यम से बच्चों को विज्ञान, गणित, कला आदि की पढ़ाई कराई जाएगी।

माध्यमिक स्तर में कक्षा 6वीं से 8वीं तक विषय आधारित पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा। 6वीं से ही व्यावसायिक और विकास कोर्स शुरू किए जाएंगे। स्थानीय स्तर पर इंटर्नशिप भी कराई जाएगी। व्यावसायिक शिक्षा और कौशल विकास पर जोर देने का उद्देश्य बच्चों के स्कूली शिक्षा के दौरान ही रोजगार हासिल किए जाने के लायक बनाना है ।द्वितीय चरण में कक्षा 9वीं से 12वीं की पढ़ाई दो चरणों में होगी जिसमें विषयों का गहन अध्ययन कराया जाएगा ।इसमें विषयों के चुनाव की स्वतंत्रता होगी। पहले 10+2 व्यवस्था के तहत सरकारी स्कूलों में प्री स्कूलिंग नहीं होती थी। कक्षा 1-10वीं तक सामान्य पढ़ाई होती थी। कक्षा 11वीं से विषय चुनने की आजादी थी। पहले 6 साल में पढ़ाई शुरू होती थी लेकिन अब नई शिक्षा नीति के तहत 3 साल से ही शुरू हो जाएगी ।

10वीं और 12वीं के बोर्ड परीक्षाओं में बड़े बदलाव किए जाएंगे ।नई शिक्षा नीति के तहत कक्षा 3री, 5वीं और 8वींमें भी परीक्षाएं होंगी। यह परीक्षाएं साल में दो बार होंगी। पहली बार ऑब्जेक्टिव और दूसरी बार सब्जेक्टिव परीक्षाएं ली जाएंगी। बोर्ड परीक्षा में मुख्य बल ज्ञान के परीक्षण पर होगा ताकि छात्रों में रटने की प्रवृत्ति समाप्त हो। इस दृष्टिकोण से यह कदम सराहनीय है। नई शिक्षा नीति में कक्षा 5वी तक या यथासंभव 8वीं तक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा होगी। मोटे तौर पर कहे तो बच्चे द्वारा बोली जाने वाली भाषा और शिक्षा के माध्यम की भाषा के बीच पुल का काम करने हेतु यह अपनाया जा रहा है। विदेशी भाषाओं की पढ़ाई द्वितीयक स्तर पर होगी यानी कक्षा 9वी से बच्चे विदेशी भाषा ले सकेंगे। विद्यार्थियों को स्कूल के सभी स्तरों एवं उच्च शिक्षा में संस्कृत को एक विकल्प के रूप में चुनने का मौका मिलेगा। त्रिभाषा फार्मूला के तहत राज्य क्षेत्र और छात्र की पसंद को प्राथमिकता दी जाएगी जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं होंगी। उदाहरण के लिए मुंबई में अगर कोई छात्र मराठी और अंग्रेजी सीखता है तो उसे तीसरी भाषा पढ़नी होगी। इसमें किसी भी छात्र पर भाषा थोपी नहीं जाएगी ।भारत के अन्य पारंपरिक भाषाएं एवं साहित्य भी विकल्प के रूप में रहेंगे।

उच्च शिक्षा में बदलाव
उच्च शिक्षा में पहली बार मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम लागू किया गया है ।इसे ऐसे समझा जा सकता है कि अगर कोई छात्र बीच में ही कोर्स छोड़ देना चाहता है तो उसके साल बर्बाद नहीं होंगे। अगर 4 साल का अंडर ग्रैजुएट कोर्स है, तो 1 साल में छोड़ने पर सर्टिफिकेट, 2 साल पर डिप्लोमा ,3 साल पर कोई इंटरमीडिएट सर्टिफिकेट और 4 साल पर डिग्री मिलेगी। यह माना जा रहा है कि इससे उन छात्रों को फायदा होगा जिनकी पढ़ाई बीच में किसी कारण छूट जाती है अगर वह कुछ साल बाद किसी दूसरे कोर्स में प्रवेश लेना चाहता है तो पहले वाले सर्टिफिकेट या डिप्लोमा को इस कोर्स में अहमियत दी जाएगी। इसे क्रेडिट ट्रांसफर माना जा सकता है ।विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों से प्राप्त अंकों या क्रेडिट को डिजिटल रूप में सुरक्षित रखने के लिए एक एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट होगा ।ताकि अलग-अलग संस्थानों में छात्रों के प्रदर्शन के आधार पर उन्हें डिग्री प्रदान की जा सके। नई शिक्षा नीति के तहत यदि कोई छात्र 2 वर्षों में ही इंजीनियरिंग कोर्स छोड़ देता है तो उसे डिप्लोमा प्रदान किया जाएगा ।इससे इस क्षेत्र के छात्रों को बड़ी राहत मिलेगी।
5 साल का संयुक्त ग्रेजुएट मास्टर कोर्स लाया जाएगा। नई शिक्षा नीति में छात्रों को यह स्वतंत्रता भी होगी की यदि वे कोई कोर्स बीच में छोड़कर दूसरे कोर्स में प्रवेश लेना चाहते हैं तो वे पहले कोर्स से खास निश्चित समय तक ब्रेक ले सकते हैं और दूसरा कोर्स ज्वाइन कर सकते हैं। 3 साल की डिग्री उन छात्रों को दी जाएगी जिन्हें उच्च शिक्षा नहीं लेना है यानी शोध में नहीं जाना है ।जिन्हें शोध करना है उन्हें 4 साल की डिग्री लेनी होगी। 4 साल के डिग्री कोर्स करने वाले छात्र 1 साल में स्नातकोत्तरकर सकेंगे इसके बाद सीधे वे पीएचडी कर सकेंगे। इसके लिए छात्रों को एमफिल करने की जरूरत नहीं होगी ।

उच्च शिक्षा में 2035 तक 50% पंजीकरण दर सुनिश्चित करना है जिसमें 3.5 करोड़ नई सीटें जोड़ने की योजना है। यह नीति 2030 तक या उसके बाद प्रत्येक जिले में कम से कम एक बड़ी बहु-विषयक संस्था बनाने पर ध्यान केंद्रित करने की बात करती है ।इसके अलावा तकनीकी संस्थानों में भी कला एवं मानवीकी के विषय पढ़ाए जाएंगे। सभी उच्च शिक्षण संस्थान समष्टिमूलक दृष्टिकोण को अपनाएंगे ।कला ,विज्ञान और वाणिज्य जैसा कोई विभाजन नहीं होगा। छात्र अपनी पसंद के कोई विषय भी चुन सकेंगे। इसे बहुत बड़ा बदलाव माना जा सकता है ।

मेडिकल और लॉ को छोड़कर सभी शिक्षण संस्थानों के लिए हायर एजुकेशन कमिशन ऑफ इंडिया बनाया जाएगा जो यूजीसी की जगह लेगा। आईआईटी और आईआईएम के दर्जे की मल्टी डिस्प्लिनीरी एजुकेशन और रिसर्च यूनिवर्सिटी बनाई जाएगी ।यह संस्थान विश्व स्तर के होंगे ।नई शिक्षा नीति के तहत देश के सभी संस्थानों में दाखिले के लिए एक कामन एंट्रेंस एग्जाम कराए जाने की बात भी कही गई है। यह एग्जाम एनटीए कराएगा। हालांकि यह ऑप्शनल होगा।

 अन्य घोषणाएं
उच्च शिक्षा में अब यूजीसी, एआईसीटीई, और एनसीटीई की जगह एक ही नियामक होगा जो संस्थानों को निर्देश देगा ।कॉलेजों को स्वायत्तता देकर 15 वर्षों के बाद विश्वविद्यालयों के संबद्धता को पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा। उन्हें धीरे-धीरे स्वायत्त बनाया जाएगा। यह कॉलेज आगे चलकर डिग्री देने वाले स्वायत्त कॉलेज बनेंगे या किसी यूनिवर्सिटी से जुड़ने वाले कॉलेज।

शिक्षा को अंतरराष्ट्रीय पहचान देने के लिए टॉप ग्लोबल रैंकिंग रखने वाली यूनिवर्सिटीज को भारत में अपने शाखा खोलने की अनुमति दी जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भारत के विद्यार्थी विश्व के बेहतरीन विश्वविद्यालयों में प्रवेश ले सकेंगे उन्हें विदेश नहीं जाना पड़ेगा। शोध करने के लिए और पूरी उच्च शिक्षा में एक मजबूत अनुसंधान संस्कृति और अनुसंधान क्षमता को बढ़ावा देने के लिए एक शीर्ष नियामक के रूप में नेशनल रिसर्च फाउंडेशन यानी एनआरएफ की स्थापना की जाएगी। इसका उद्देश्य विश्वविद्यालयों में शोध की संस्कृति को सक्षम बनाना है। एनआरएफ स्वतंत्र रूप से सरकार द्वारा एक बोर्ड ऑफ गवर्नर द्वारा शासित किया जाएगा। इलेक्ट्रॉनिक पाठ्यक्रम क्षेत्रीय भाषाओं में विकसित किए जाएंगे।वर्चुअल लैब विकसित किया जाएगा।एक राष्ट्रीय शैक्षिक तकनीकी फोरम बनाया जाएगा ।सभी भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं जीवंत बनाने के लिए नई शिक्षा नीति में पाली, फारसी और प्राकृत भाषाओं के लिए अनुवाद संस्थान की स्थापना की जाएगी। शिक्षकों के लिए भी राष्ट्रीय प्रोफेशनल मानक, राष्ट्रीय अध्यापक परिषद द्वारा 2022 तक विकसित किया जाएगा ।इसके लिए एनसीईआरटी और एसईआरटी जैसी संस्थाओं के विशेषज्ञों से परामर्श लिया जाएगा।
कुल मिलाकर इस नई शिक्षा नीति में जिन बिंदुओं पर फोकस किया गया है। उनमें लचीलापन, अंत:विषयी पाठ्यक्रम का होना, सृजनात्मकता और तर्क-वितर्क की प्रणाली विकसित करना, कौशल अभिक्षमता, नैतिकता और मानवीय मूल्य के संवैधानिक कर्तव्य मुख्य रूप से शामिल हैं।

चुनौतियाँ
1 .नई शिक्षा नीति के मुताबिक सरकार जीडीपी का 6% खर्च करने की बात कह रही है ।हालांकि 1986 के नई शिक्षा नीति में भी यही बात कही गई थी ।लेकिन वास्तविकता अलग है।2017-18 में भारत सरकार ने जीडीपी का केवल 2.7% ही शिक्षा पर खर्च किया । 2017-18 में शोध कार्य पर जीडीपी का 0.7% खर्च किया गया। तो खर्च के मामले में सरकार इतनी बड़ी छलांग कैसे लगा पाएगी। इस पर स्थिति साफ नहीं है।
2.सकल पंजीकरण दर 26.3% से बढ़ाकर 50% रखा गया है। आर्थिक-सर्वे 2017-18 के अनुसार देश में प्रति एक लाख आबादी पर शोध करने वालों की संख्या मात्र 15 है ।सरकार ने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए 3.5 करोड़ नई सीटें भरने की भी बात की है ।सवाल यह है कि इससे इसके लिए सरकार के पास क्या खाका है। इस लक्ष्य को कैसे हासिल किया जाएगा ।
3.यूजीसी, एआईसीटीई, एनसीटीई के स्थान पर एक नियामक को लेकर भी विवाद है। जानकारों का मानना है कि इस नियामक की कमान केंद्र सरकार के हाथ में होगी ।इसलिए उच्च शिक्षा का केंद्रीकरण होगा ।जिससे संस्था के स्वायत्तता की राह में रुकावट होगी ।अब जब शिक्षा के विकेंद्रीकरण का समय है तब सरकार बेवजह ही इसे उलझाने की कोशिश में है। इस दशा में केंद्र सरकार राज्य सरकार की समस्याओं को अनदेखी कर सकती है।
4.शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है इसलिए इसमें केंद्र और राज्य दोनों अलग-अलग कानून बनाकर इसका क्रियान्वयन करते हैं। भारत में ज्यादातर विश्वविद्यालय राज्य विश्वविद्यालय हैं। इस स्थिति में सरकार कैसे सामंजस्य बनाती है। यह देखना होगा।
5.दिल्ली जैसे शहर में अलग-अलग जगह के लोग रहते हैं तब इस स्थिति में मातृभाषा ,स्थानीय भाषा के बीच शिक्षा के माध्यम में सामंजस्य कैसे बिठाया जाएगा।
6.अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूल क्या मातृभाषा या स्थानीय भाषा में पढ़ाने पर सहमत होंगे।
7.एक राज्य से दूसरे राज्य में शिफ्ट करने वाले छात्रों के लिए सरकार क्या उपाय अपना आएगी।
8.उच्च शिक्षा में नौकरी करने के लिए सहायक प्राध्यापक की चयन प्रक्रिया कई तरह से होती है ।पहली,जिसमें अभ्यर्थी आवेदन करता है और एपीआई (API) के अनुसार साक्षात्कार देता है। दूसरी, जिसमें अभ्यर्थी आवेदन करके लिखित परीक्षा क्वालीफाइंग करता है और साक्षात्कार देता है । यह दोनों प्रक्रिया अंतिम रूप से साक्षात्कार पर निर्भर है, यानी कि चयन कमेटियों की मनमानी पर। तीसरी, जिसमें आवेदक आवेदन करता है और लिखित परीक्षा पास करके साक्षात्कार देता है ।उसका चयन लिखित और साक्षात्कार के अंको को जोड़कर होता है। यह प्रक्रिया हद तक पारदर्शी होती है । तो क्यों न एक नेशनल हायर एजुकेशन रेगुलेटरी अथॉरिटी या संघ लोक सेवा आयोग की तरह एक चयन आयोग हो।वह 85%लिखित परीक्षा और 15% साक्षात्कार (दोनों को जोड़कर)के आधार पर प्रत्येक वर्ष रिक्त पदों पर भर्ती करें और पारदर्शी ढंग से चयन करें। रैंकिंग के हिसाब से अभ्यर्थियों का केंद्रीय विश्वविद्यालय ,राज्य विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के लिए चयन हो। इससे अभ्यर्थियों के चयनित होने न होने की खुद जिम्मेदारी रहेगी।उन्हें अपनी मेहनत पर भरोसा रहेगा।न कि ताकतवर चयन कमेटियों के सदस्यों के निर्णयों पर अफसोस।इसे भाई भतीजावाद पर भी नियंत्रण होगा।अन्यथा ताकतवर चयन कमेटी के सदस्यों द्वारा प्रत्येक साल किसी न किसी विश्वविद्यालय में एनएफएस(NFS) का मामला आता रहेगा। चाहे वह आरक्षित वर्ग का हो या अनारक्षित वर्ग का। जिसकी पहुंच इन चयन कमेटियों तक नहीं होगी। उसे इस वर्ग में रख दिया जाएगा।तब इसे ‘नॉट फाउंड सुटेबल’की जगह ‘नो फ्यूचर सेव’ (NFS) ही कहना पड़ेगा।

संभावनाएं
इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस नीति को लागू करने में सरकार को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। सभी घोषणाओं को व्यवहारिक रूप में अपनाने के लिए बुनियादी अवसंरचना की जरूरत होगी ।इससे भी ज्यादा राजनीतिक इच्छा शक्ति को मजबूत करना होगा। नीति क्रियान्वयन कितना मुश्किल है इस बात का अंदाजा ऐसे लगाया जा सकता है कि अभी शिक्षा के लिए आवंटित धन का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता। यह स्थिति तब है जब हमारी सरकारें दूसरे देशों की तुलना में कम खर्च करती हैं।पिछले 5 सालों में 4 साल ऐसे बीते हैं जिसमें शिक्षा के लिए जारी बजट को पूरा खर्च नहीं किया जा सका ।

2014-15 में आवंटित बजट की 17% रकम खर्च नहीं की जा सकी जो पिछले 10 सालों में सबसे ज्यादा है ।शिक्षा में सुधार के लिए सबसे जरूरी यह है कि शिक्षण संस्थाओं में स्वायत्तता को कायम किया जाए ।सरकार को अपने 200 शीर्ष रैंक वाले विश्वविद्यालयों को शैक्षणिक,प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वायत्तता प्रदान करनी चाहिए ।ताकि वे वैश्विक नवाचार को बढ़ावा देने के लिए नवीनतम पाठ्यक्रमों में विविधता ला सकें। वैसे भी भारत नवाचार और अनुसंधान पर कम खर्च करता है।2017-18 में भारत ने जीडीपी का 0.7% शोध कार्यों पर खर्च किया।जबकि अन्य देशों -चीन 2.1% ,अमेरिका 2.8% और इजराइल 4.23 % अपने जीडीपी का हिस्सा शोध कार्यों पर खर्च किया। भारत के टॉप विश्वविद्यालयों को हर साल 50,000 से अधिक पीएचडी कराना होगा तभी अनुसंधान के क्षेत्र में एक नया आयाम विकसित हो सकता है। विश्वविद्यालयों में सभी जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे की कमी है इसके लिए जरूरी है कि सरकार विश्वविद्यालयों को 20 30 वर्ष तक के लिए दीर्घकालिक ऋण मुहैया कराए ताकि वे अपने अवसंरचना को बेहतर कर सकें।

बहरहाल , नई शिक्षा नीति-2020 एक महत्वाकांक्षी और प्रगतिशील दस्तावेज है। इसमें लचीलापन है ।उम्मीद की जा सकती है कि इसे सख्ती से लागू किया जाए। लेकिन इसके क्रियान्वयन की समय सीमा 2040 तक निर्धारित की गई है। जोकि एक लंबी अवधि हो जाती है।यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि तब तक देश में कैसे हालात बनेंगे । अगर वैधानिक रूप से देखा जाए तो नीतियां कानून नहीं होतीं।यह सरकार द्वारा एक संकल्प मात्र होता है। यह एक गाइडलाइन है। सभी प्रस्तावों को लागू करने के लिए लॉ बनाने होंगे।उदाहरण के लिए यूजीसी को हटाने के लिए उसके एक्ट 1956 में संशोधन करना होगा। यह भी समझना होगा कि शिक्षा हमारे लिए स्थाई विषय वस्तु की तरह है। अब देखना होगा कि सरकार इसे कैसे लागू करेगी, यह भविष्य के गर्भ में है। कहीं यह भी पुरानी राष्ट्रीय शिक्षानीतियों की तरह ही कमजोर राजनीतिक दृढ़ संकल्प की शिकार न हो जाय,इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

डॉ. रजनीश कुमार यादव की उच्च शिक्षा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली से हुई है।वर्तमान में जे .पी. यूनिवर्सिटी छपरा बिहार में अस्सिटेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।

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