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जवाहरलाल नेहरू  के समाजवाद की अवधारणा में लोकतंत्र का विचार केन्द्रीयता में है, यह भी कहा जा सकता है कि लोकतंत्र उनकी समाजवादी धारणा का प्रारम्भिक और अंतिम बिन्दु है।वस्तुतः लोकतंत्र एक ऐसा तथ्य है जो मार्क्सवादी समाजवाद से उनके समाजवाद की भिन्नता प्रकट करता है। नेहरू ने लोकतंत्र को एक गतिशील अवधारणा तथा नैतिक जीवन-दृष्टि के रूप में स्वीकारा है। उनकी लोकतंत्र की अवधारणा बहु-आयामी है, जो राजनीतिक लोकतंत्र से क्रमशः सामाजिक लोकतंत्र तथा आर्थिक लोकतंत्र की दिशा में विकसित होती है। नेहरू ने आर्थिक लोकतंत्र के विशिष्ठ रूप को लोकतांत्रिक समाजवाद कहा है।

नेहरू के लोकतंत्र की तरह ही उनके समाजवाद की धारणा भी गतिशील एवं व्यापक  है और वे इसे जीवन के नैतिक दृष्टिकोण के रूप में देखते हैं।

लोकतंत्र के बारे में नेहरू का यह कथन उनकी समाजवाद की अवधारणा के पूर्णतः निकट है, “यह अवसर की समानता को उस सीमा तक सब व्यक्तियों को प्रदान करता है, जिस सीमा तक  राजनीतिक व आर्थिक कार्यक्रमों में ऐसा करना संभव हो पाता है। यह व्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ सामर्थ्य और योग्यतानुसार उच्च विकास के विचार का संयोग करता है।” 

लोकतंत्र (राजनीतिक लोकतंत्र) तथा समाजवाद की घनिष्ठता को स्वीकारते हुए  नेहरू ने बताया है कि लोकतंत्र का वास्तविक विकास समाजवाद में ही होता है। 

1948 में कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन में  नेहरू ने कहा था, “लोकतंत्र का अपिहार्य परिणाम समाजवाद है। राजनीतिक लोकतंत्र में यदि आर्थिक लोकतंत्र सम्मिलित नहीं है तो वह अर्थहीन है।”

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