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ऑनलाइन शिक्षा का मतलब अपने घर या निश्चित स्थान पर ही इंटरनेट और अन्य संचार उपकरणों की सहायता से प्राप्त की जाने वाली शिक्षा से है। अगर देखा जाय तो ऑनलाइन शिक्षा के विभिन्न रूप हैं, जिसमें वेब आधारित लर्निंग, मोबाइल आधारित लर्निंग या कंप्यूटर आधारित लर्निंग और वर्चुअल क्लासरूम इत्यादि शामिल हैं। आज से जब कई वर्ष पहले ऑनलाइन शिक्षा की अवधारणा आई थी, तो दुनिया इसके प्रति उतनी सहज नहीं थी,लेकिन समय के साथ ही ऑनलाइन शिक्षा ने संपूर्ण शैक्षिक व्यवस्था और शिक्षण संस्थानों में अपना स्थान बनाने का प्रयास किया है।अपने देश की बात करें तो भारत में ऑनलाइन शिक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा शैक्षणिक उपकरणों और संचार माध्यमों का उपयोग करते हुए  प्रदान  करने की कोशिश की गयी  ।जिसने दुनियाभर में अपनी पहचान भी  बनाई है।

सहीमायने में अभी भारत में ऑनलाइन शिक्षा अपने प्रारंभिक चरण में है। 
भारत में कोविड-19 महामारी के कारण लॉकडाउन की शुरुआत से ही लगभग सभी शिक्षण संस्थाएँ शैक्षणिक कार्यों के लिये ऑनलाइन शिक्षा को एक विकल्प के रूप में प्रयोग कर रही हैं, ऐसे में देश की आम जनता के बीच ऑनलाइन शिक्षा के प्रति रुचि में अत्यधिक बढ़ोतरी हुई है। हालाँकि जहाँ एक ओर कई विशेषज्ञों ने वर्तमान महामारी के दौर में ऑनलाइन शिक्षा के महत्त्व को स्वीकार किया है तो, वहीं कुछ आलोचकों का मत है कि ऑनलाइन शिक्षा, अध्ययन की पारंपरिक पद्धति का स्थान नहीं ले सकती है।
ऑनलाइन शिक्षण एक ऐसी व्यवस्था है जिस पर कई संस्थान विचार कर रहे हैं, लेकिन क्या भारतीय छात्रों के पास ऑनलाइन पढ़ाई के लिए मज़बूत नेटवर्क है? भारतीय घरों में इंटरनेट की उपलब्धता एक चिंता का विषय है, खासकर ग्रामीण भारत में रहने वाले छात्रों के घरों तक इंटरनेट की पहुंच बहुत कमजोर है।

ऑनलाइन शिक्षा के लिए सरकार के द्वारा किये गए प्रयास :

स्वयं (SWAYAM) :स्टडी वेब्स ऑफ एक्टिव लर्निंग फॉर यंग एस्पायरिंग माइंड्स (SWAYAM) एक एकीकृत मंच है जो स्कूल से लेकर स्नातकोत्तर स्तर तक ऑनलाइन पाठ्यक्रम प्रदान करता है। अब तक स्वयंपर 2769 बड़े पैमाने के ऑनलाइन खुला पाठ्यक्रम(MOOC) है।जिसमें लगभग 1.02 करोड़ छात्रों ने विभिन्न पाठ्यक्रमों में दाखिला लिया है।

ऑनलाइन पाठ्यक्रमों का उपयोग न केवल छात्रों द्वारा बल्कि शिक्षकों और गैर-छात्र शिक्षार्थियों द्वारा भी जीवन में कभी भी सीखने के रूप में किया जा रहा है। 
NCERT कक्षा 9-12 तक के लिये बारहविषयों में स्कूल शिक्षा प्रणाली के लिए बड़े पैमानेपर ऑनलाइन पाठ्यक्रमों का मॉड्यूल विकसित कर रहा है।

स्वयं प्रभा (SWAYAM Prabha) :यह 24X7 आधार पर देश में सभी जगह डायरेक्ट टू होम(DTH) के माध्यम से 32 उच्च गुणवत्ता वाले शैक्षिक चैनल प्रदान करने की एक पहल है।इसमें पाठ्यक्रम आधारित पाठ्य सामग्री होती है जो विविध विषयों को कवर करती है।इसका प्राथमिक उद्देश्य गुणवत्ता वाले शिक्षण संसाधनों को दूरदराज़ के ऐसे क्षेत्रों तक पहुँचाना है जहाँ इंटरनेट की उपलब्धता अभी भी एक चुनौती बनी हुई है।

राष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी (NDL) :

भारतकी राष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी(NDL) एक एकल-खिड़की खोज सुविधा के तहत सीखने के संसाधनों के आभाषी भंडार का एक ढाँचा विकसित करने की परियोजना है।इसके माध्यम से यहाँ 3 करोड़ से अधिक डिजिटल संसाधन उपलब्ध हैं।लगभग 20 लाख सक्रिय उपयोगकर्त्ताओं के साथ 50 लाख से अधिक छात्रों ने इसमें अपना पंजीकरण कराया है।


स्पोकन ट्यूटोरियल :छात्रों की रोज़गार क्षमता को बेहतर बनाने के लिये ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर पर 10 मिनट के ऑडियो-वीडियो ट्यूटोरियल उपलब्ध हैं। यह सभी 22 भाषाओं की उपलब्धता के साथ ऑनलाइन संस्करण है जो स्वयं सीखने के लिये बनाया गया है।स्पोकन ट्यूटोरियल के माध्यम से बिना शिक्षक की उपस्थिति के पाठ्यक्रम को प्रभावी रूप से नए उपयोगकर्त्ता को प्रशिक्षित करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।

शिक्षा के लिये नि:शुल्क और ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर :यह शिक्षण संस्थानों में ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर के उपयोग को बढ़ावा देने वाली एक परियोजना है। इसमें शिक्षण कार्य, जैसे कि स्पोकन ट्यूटोरियल्स, डॉक्यूमेंटेशन, जागरूकता कार्यक्रम, कॉन्फ्रेंस, ट्रेनिंग वर्कशॉप इत्यादि इंटर्नशिप के माध्यम से किया जाता है। इस परियोजना में लगभग 2,000 कॉलेज के छात्रों और शिक्षकोंने इस गतिविधि में भाग लिया है।

वर्चुअल लैब :इस प्रोजेक्ट का उपयोग प्राप्त ज्ञान की समझ का आकलन करने, आँकड़े एकत्र करने और सवालों के उत्तर देने के लिये पूरी तरह से इंटरेक्टिव सिमुलेशन एन्वायरनमेंट विकसित करना है।महत्त्वाकांक्षी परियोजना के उद्देश्यों को प्राप्त करने, वास्तविक दुनिया के वातावरण और समस्याओं से निपटने की क्षमता विकसित करने के लिये अत्याधुनिक कंप्यूटर सिमुलेशन तकनीक के साथ आभासी प्रयोगशालाओं को विकसित करना आवश्यक है। इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत 1800 से अधिक प्रयोगों के साथ लगभग 225 ऐसी प्रयोगशालाएँ संचालित हैं और 15 लाख से अधिक छात्रों को लाभ प्रदान कर रही हैं।

ई-यंत्र (e-Yantra) : यह भारत में इंजीनियरिंग कॉलेजों में एम्बेडेड सिस्टम और रोबोटिक्स पर प्रभावी शिक्षा को सक्षम करने की एक परियोजना है।शिक्षकों और छात्रों को प्रशिक्षण कार्यशालाओं के माध्यम से एम्बेडेड सिस्टम और प्रोग्रामिंग की मूल बातें सिखाई जाती हैं।

NCERT द्वारा ई- रिसोर्सेज़ :जैसे ऑडियो, वीडिओ इंटरएक्टिव आदि के रूप में विकसित अध्ययन सामग्री को वेब पोर्टल्स के माध्यम से हितधारकों के साथ साझा किया गया है।

इससे पहले भी देश में ‘इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी’ (IGNOU) और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) तथा कई अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों के द्वारा दूरस्थ शिक्षा को बढ़ावा देने के कई सफल प्रयास किये गए हैंI

ऑनलाइन शिक्षा की सीमाएँ :

1.ऑनलाइन शिक्षा की सबसे बड़ी अच्छाई यह है कि छात्र अपनी सुविधा के हिसाब से किसी भी समय और कहीं पर भी अपना शैक्षिक कार्य कर सकते हैं।इसका मतलब शैक्षिक व्यवस्था में समय और स्थान की कोई पाबंदी नहीं है।

2.इसके माध्यम से छात्र वेब आधारित अध्ययन सामग्री को दीर्घकाल तक के लिए सुरक्षित कर सकते हैंऔर बार-बार देख कर इसके कठिन बिन्दुओं को समझ सकते हैं।

3. देखा जाय तो ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से पढ़ाई करना काफी हद तक कम लागत वाली होती है।इसमें एक बार उपकरणों को खरीदने में जो लागत लगे।वही खर्च होता है।क्योंकि छात्रों को पुस्तकें या किसी दूसरे अध्ययन सामग्री पर पैसा खर्च नहीं करना पड़ता है।

4.यह पर्यावरण संरक्षण की दृष्टिकोण से भी कारगर है, क्योंकि यहाँ जानकारी को पुस्तक की जगह वेब आधारित एप व पोर्टल पर संग्रहित किया जाता है। जिससे कागज़ के निर्माण हेतु पेड़ों की कटाई पर रोक लगती है और हमारे पर्यावरण को बचाने में मदद मिलती है।

5.शिक्षा इंटरनेट और कंप्यूटर कौशल का ज्ञान विकसित करता है जो विद्यार्थियों को अपने जीवन और करियर के क्षेत्र में आगे बढ़ने में मदद करेगा।

6.ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से छात्र नए कौशल सीखने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैंl

ऑनलाइन शिक्षा की चुनौतियाँ:

1.यह कहना गलत नहीं होगा कि कोविड-19 महामारी से पहले भारत के अधिकांश शिक्षण संस्थानों को ऑनलाइन शिक्षा का कोई विशेष अनुभव नहीं रहा है।इस स्थिति में शिक्षण संस्थानों के लिये अपनी व्यवस्था को ऑनलाइन शिक्षा के अनुरूप बनाना और छात्रों को अधिक-से-अधिक शिक्षण सामग्री ऑनलाइन उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरकर सामने आया है।

 2.वर्तमान समय में भी भारत में डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की बहुत कमी है, देश में अब भी उन छात्रों की संख्या काफी सीमित है, जिनके पास लैपटॉप या टैबलेट कंप्यूटर जैसी सुविधाएँ उपलब्धहैं। अतः ऐसे छात्रों के लिये ऑनलाइन कक्षाओं से जुड़ना एक बड़ी समस्या है।

3.शिक्षकों के लिये भी तकनीक एक बड़ी समस्या है, देश के अधिकांश शिक्षक तकनीकी रूप से इतने प्रशिक्षित नहीं है कि औसतन 30 बच्चों की एक ऑनलाइन कक्षा आयोजित कर सकें और उन्हें ऑनलाइन ही अध्ययन सामग्री उपलब्ध करा सकें।
इंटरनेट पर कई विशेष पाठ्यक्रमों या क्षेत्रीय भाषाओं से जुड़ी अध्ययन सामग्री की कमी होने से छात्रों को समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

4.कई विषयों में छात्रों को व्यावहारिक शिक्षा यानी प्रैक्टिकल की आवश्यकता होती है, जैसे कि विज्ञान या भूगोल आदि।अतः दूरस्थ माध्यम से ऐसे विषयों को सिखाना शिक्षकों के लिए काफी मुश्किल और चुनौतीपूर्ण होता है।

5.कोविड-19 महामारी के कारण देश भर में ऑनलाइन शिक्षा का महत्त्व काफी बढ़ गया है,लेकिन सामाजिक असमानता और डिजिटल डिवाइड ऑनलाइन शिक्षा के समक्ष अभी भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

6.मानव संसाधन विकास मंत्रालय,जो अब शिक्षा मंत्रालय हो गया है।इसके अंतर्गत स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग के अनुमान के अनुसार महामारी के कारण बंद हुए स्कूलों को फिर से खोलने के लिये स्वच्छता और क्वारंटाइन उपायों हेतु प्रति स्कूल 1 लाख रुपए तक खर्च करने की आवश्यकता होगी।

7.लगभग 3.1 लाख सरकारी स्कूलों, जिनके पास सूचना और संचार तकनीक सुविधाएँ नहीं हैं, उनको ऐसी सुविधाओं से युक्त करने के लिये केंद्र सरकार 55,840 करोड़ रुपए का बजट प्रस्तावित करेगी।

8.शिक्षा मंत्रालय(पूर्व में MHRD)ने आगामी पाँच वर्षों में डिजिटल पाठ्यक्रम सामग्री और संसाधनों के विकास एवं अनुवाद पर 2,306 करोड़ रुपए खर्च करने का प्रस्ताव किया है।

9.केंद्र सरकार ने वर्ष 2026 तक देश भर के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले लगभग 4.06 करोड़ छात्रों को लैपटॉप और टैबलेट प्रदान करने की भी योजना बनाई है।जो कि देश की कुल छात्र संख्या का लगभग 40 %हैl इस कार्य के लिये कुल 60,900 करोड़ रुपए का बजट निर्धारित किया गया है। हालाँकि इससे पहले उत्तर प्रदेश की सपा सरकार (2012)ने लगभग 20 लाख लैपटॉप देकर  और छत्तीसगढ़ की रमन सरकार ने भी विधान सभा चुनाव (2018)से ठीक पहले विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में मोबाइल वितरण करके छात्रों को तकनीक से जोड़ने का प्रयास किया ।

अन्य चुनौतियां :

  • बिना आत्म अनुशासन और अच्छे संगठनात्मक कौशल के अभाव में विद्यार्थी ऑनलाइन शिक्षा माध्यम में की जाने वाली पढ़ाई में पिछड़ सकते हैं।
  • छात्र बिना किसी शिक्षक और सहपाठियों के अकेला महसूस कर सकते हैं। परिणामस्वरूप वे अवसाद से पीड़ित हो सकते हैं।और अन्य बीमारियों से भी ग्रसित हो सकते हैं।
  • खराब इंटरनेट कनेक्शन या पुराने कंप्यूटर, पाठ्यक्रम एक्सेस करने वाली सामग्री को निराशाजनक बना सकते हैं।
  • वैसे भी भारत में बेहतर इंटरनेट कनेक्टिविटी की कमी और इंटरनेट की कम गति ऑनलाइन शिक्षा की राह में सबसे बड़ी चुनौती है।
  • वर्चुअल क्लासरूम में प्रैक्टिकल या लैब वर्क करना मुश्किल होता है। 
    कितने कारगर हैं शिक्षण संस्थान :

इन कठिन परिस्थितियों में शिक्षण संस्थान कितने कारगर हैं यह महत्त्वपूर्ण सवाल है l  असली भारत गाँव में बसता है।कुछ चुनिंदा और महानगरों के  शिक्षण संस्थानों को छोड़ दिया जाय तो इसके अधिकतर शिक्षण संस्थान ग्रामीण क्षेत्रों में हैं।भले ही कुछ क्षेत्र शहरी होने का दर्जा रखते हों लेकिन वहां भी शिक्षण संस्थानों की स्थितिचिंताजनक है Iजहां ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी क्षेत्रों की तरह बिजली व्यवस्था का अभाव और बिजली उपलब्धता खराब है, जो ऑनलाइन शिक्षा में बड़ी बाधक बन सकती है।इसमें परेशानी यह है कि इंटरनेट के माध्यम से केवल कुछ छात्रों से जुड़ना आसान होगा और एक बड़ी संख्या में छात्रों तक पहुंच पाना काफी कठिन होगा। ऐसा करने में न केवल शिक्षण कला से समझौता किया जाएगा, बल्कि छात्रों को जो सिखाया जा सकता है उसमे भी असमानता बढ़ सकती है।

छात्रों को मिल रहे शिक्षण संसाधनों तक उनके पहुँच में डिजिटल विभाजन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। कई सार्वजनिक संस्थानों ने ऐसी समस्याओं के लिए ऑनलाइन विकल्प आज़माने की कोशिश भी नहीं की है जो प्रशासकों के लिए वास्तविक चिंता का कारण बन रहा है।यह मामला इतना आसान नहीं है। भारत में किसी भी चीज तक पहुंच की असमानता सर्वव्यापी है, लेकिन भारत में विश्वविद्यालय स्तर के संस्थानों में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र ऐसे हैं जो अपने सामाजिक समूह में सबसे अधिक विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं। शायद, इंटरनेट के माध्यम से इन छात्रों तक पहुंचना संभव है।लेकिन वास्तविक तथ्य क्या हैं?घर पर इंटरनेट और सामान्य रूप से इंटरनेट तक पहुंच के बीच अंतर है।

राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट (2014) के अनुसार, भारत में केवल 27 प्रतिशत परिवार ही ऐसे हैं जिनके किसी एक सदस्य के पास इंटरनेट सुविधा उपलब्ध है। इंटरनेट की उपलब्धता का अर्थ यह नहीं है कि परिवार के पास वास्तव में घर पर इंटरनेट हो। वास्तव में, वो परिवार जिनके पास इंटरनेट उपलब्ध है उनमे से केवल 47 प्रतिशत ऐसे हैं जिनके पास स्मार्टफोन हैं।सामान्यत: जिन लोगों के घर में इंटरनेट है वे इस बात की जानकारी दे देते हैं। इस लिए कितने घरों में इंटरनेट है इसके पुख्ता अनुमान न होते हुए भी मोटे तौर पर उसका अनुमान लगाया जा सकता है। इससे यह सूचना भी मिलती है कि उनके पास ऐसा उपकरण है या नहीं जिसका उपयोग किसी वेबसाइट पर जाने के लिए किया जा सकता है। अनुमानतः भारत में केवल 12.5 प्रतिशत छात्रों के परिवारों में इंटरनेट का उपयोग होता है।

शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी की वास्तविकता :

शहरी क्षेत्रों में 27 प्रतिशत के पास इंटरनेट है और ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 5 प्रतिशत के पास है । वर्तमान संकट को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि जो छात्र इन ग्रामीण क्षेत्रों में हैं उनके लिए ऑनलाइन कक्षाएं आयोजित करना उतना उपयोगी सिद्ध नहीं होगा जितना होना चाहिए। शायद यही वह दृष्टिकोण है जो लोगों को ऑनलाइन कक्षाओं के बारे में आशंकित कर रहा है।एक तथ्य की तरफ और ध्यान दें तो इस समय घर पर इंटरनेट और सामान्य रूप से इंटरनेट तक पहुंच के बीच अंतर महत्वपूर्ण है। भारत के कुछ राज्यों में यह अंतर बहुत अधिक है। जहाँ, केरल में 51 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास विभिन्न स्रोतों के माध्यम से इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है, वहीं केवल 23 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के घर में इंटरनेट की पहुंच है। यह अंतर आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी स्पष्ट दिखता है जहां 30 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों में इंटरनेट का उपयोग होता है, लेकिन घर पर इंटरनेट की पहुंच केवल 2 प्रतिशत परिवारों तक ही है।

उत्तरप्रदेश,बिहार,झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जिनमें पारंपरिकरूप से प्रवासी छात्र बड़ी संख्या में हैं, जो दिल्ली,वाराणसी,इलाहबाद,हैदराबाद और कोटा जैसे शहरों में रहते हैं Iयहाँकेवल 7-8 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास इंटरनेट तक पहुंच है। जिस अनुपात में घर तक इंटरनेट की पहुँच है वह एक बहुत छोटी संख्या है। भारत के राज्यों में शहरी परिवारों के बीच इंटरनेट पहुंच का अंतर कम है। हालांकि शहरी परिवारों में घर तक इंटरनेट की पहुंच स्पष्ट रूप से अभी भी गंभीर बाधा हो सकती है क्योंकि उप्र, बिहार ,छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में केवल 18 और 21 प्रतिशत शहरी परिवार ही ऐसे हैं जो घर पर कोई वेबसाइट खोल या देख सकते हैं।

विश्वविद्यालय में  शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र एक चयनित समूह से हैं, इसलिए घर पर उनकी कनेक्टिविटी बहुत बेहतर हो सकती है। ऐसे बच्चे जो शहरी परिवारों से संबंधित हैं और विश्वविद्यालयों में अध्ययन करते हैं उनमें से 85 प्रतिशत बच्चों की इंटरनेट तक पहुँच है, लेकिन घर तक इंटरनेट की पहुँच लगभग51 प्रतिशत लोगों के पास है। ग्रामीण परिवारों के बच्चों में उनमें से केवल 28 प्रतिशत के पास घर पर इंटरनेट की पहुंच उपलब्ध है। इस तरह की कम पहुंच एक बड़ी चिंता का विषय है क्योंकि विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले 55 प्रतिशत बच्चे ग्रामीण परिवारों से हैं। ऐसे में, इंटरनेट के माध्यम से ऐसे बच्चों को दिया जा रहा ऑनलाइन शिक्षण, भारी मात्रा में ग्रामीण भारत के बच्चों को पढाई से वंचित कर देगा।

देश में कई विश्वविद्यालय और संस्थान आवासीय कार्यक्रम संचालित करते हैं। लगभग 50 लाख छात्र, जो सभी विश्वविद्यालय स्तर के छात्रों का 15 प्रतिशत हिस्सा है,वे अपने घरों से दूर रहते हैं। उनमें से एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण परिवारों से आने वाले छात्रों का है।यह आकड़ा  लगभग 55 प्रतिशत है l

वर्तमान संकट के कारण छात्रावासों को खाली करवा दिया गया और छात्रों को घर वापस जाने के लिए कहा गया । ये छात्र ऑनलाइन शिक्षण के प्राथमिक संभावित प्राप्तकर्ताओं में से एक हैं। ये छात्र वास्तव में अधिक चयनित हैं लेकिन उनमें से लगभग 48 प्रतिशत के पास घर में इंटरनेट उपलब्ध है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले केवल 42 प्रतिशत छात्रों के पास घर पर कोई वेबसाइट खोल या देख सकते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में निवास करने वाले छात्रों में से 69 प्रतिशत छात्र ऐसे हैं जो घर पर ऑनलाइन हो सकते हैं।घर पर इंटरनेट पहुंच कम होने के कारण ग्रामीण क्षेत्र के घरों में, समस्या उपकरणों के स्वामित्व की है क्योंकि आधे से अधिक घरों में स्मार्टफोन या कंप्यूटर नहीं है। शहरी परिवारों के बीच यह समस्या कम गंभीर है, क्योंकि ऐसे 71 प्रतिशत परिवारों के पास ये उपकरण हैं, इसलिए वहां बाधा इंटरनेट कनेक्शन की पहुंच से संबंधित है।

सभी विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच समग्र पहुंच के सापेक्ष छात्रावास में रहने वाले छात्रों के लिए उच्चतर घरेलू इंटरनेट पहुंच का अर्थ यह है कि, जिस समूह में वास्तव में घरेलू इंटरनेट पहुंच सबसे खराब है वे छात्र हैं, विशेषकर जिनके घर ग्रामीण भारत में हैं। ऐसे छात्रों से कैसे जुड़ा जाए? हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि वे अध्ययन के लिए शहरों में हीं जाते हैं, फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों के कम से कम 30 प्रतिशत ऐसे लोग जिनके पास घर में इंटरनेट उलपब्ध नहीं है, वे अपने घरों से 5 किलोमीटर या उससे अधिक दूर स्थित संस्थानों पर जाकर अध्ययन करते हैं।

लेकिन इन वास्तविकताओं के बाद भी कुछ केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपति इसे समस्या के रूप में नहीं देख रहे I जेएनयू के कुलपति एक निजी चैनल के साक्षात्कार में कहते हैं “भले ही स्मार्टफोन में केवल 2G नेटवर्क कनेक्शन हो, फिर भी वीडियो डाउनलोड करना, ऑडियो फ़ाइलें, दस्तावेज़ और लाइव ऑडियो मीटिंग्स में भाग लेना संभव है। इसलिएउन छात्रों के साथ जुड़ना जो कमजोर नेटवर्क कनेक्टिविटी वाले दूरस्थ क्षेत्रों से हैं, चुनौती नहीं होगी। जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय में ऑनलाइन शिक्षण बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर काम कर रहे हैं, शिक्षकों के लिए कई वेबिनार और अन्य सूचना वीडियो कॉन्फ्रेंस आयोजित कर रहे हैं ताकि वे ज्ञान प्रदान करने के नए तरीके को अपना सकें।भारत जैसे देशों में, विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के छात्रों को उच्च गुणवत्ता की शिक्षा तक अधिक पहुँच प्रदान करने के लिए ऑनलाइन लर्निंग एक गेम चेंजर के रूप में उभरेगी”lइसी में आगे वे कहते हैं-“कोविड -19 प्रेरित लॉकडाउन हमें‘कहीं से भी, कभी भी सीखकर’अवधारणा के साथ पारंपरिक शिक्षण को पूरक बनाने में मदद करेगा। भारत जैसे देश में, विभिन्न सामाजिक-छात्रों के लिए उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा तक अधिक पहुंच प्रदान करने में इसका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा-आर्थिक पृष्ठभूमि l विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में लगभग हर छात्र के पास स्मार्टफोन तक पहुंच है, जो उन्नत ई-लर्निंग मॉड्यूल तक पहुंच के लिए आवश्यक है। भारत में, हमारे पास 500 मिलियन से अधिक स्मार्टफोन उपयोगकर्ता हैं और संख्या तेजी से बढ़ रही है। भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों में, हमारे पास 34 मिलियन छात्र हैं। इसलिए, यह मान लेना सुरक्षित है कि हमारे विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रत्येक छात्र एक स्मार्टफोन का मालिक है”। यही हॉल अन्य केन्द्रीय विश्वविद्यालयों का भी हैIयूजीसी,राजभवन और उच्च शिक्षा विभाग के सचिवों के पत्रों के दबाव में शिक्षण संस्थानों द्वारा आनन–फानन में ऑनलाइन शिक्षा दी जा रही है l कई  विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की वेबसाइट तकनीकि रूप से धीमी और ख़राब रहती है  l कुछ वर्ष पहले ही हिंदी पट्टी और बिहार जैसे राज्यों में उच्च शिक्षा की स्थिति कितनीदयनीय है  इसका जिक्र एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार ने अपने एक कार्यक्रम ‘विश्वविद्यालय सीरीज’ में किया था l फिर भी राजभवन के निर्देशानुसार राज्य के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में ऑनलाइन शिक्षा दी जा रही है I पीडीएफ,ऑडियो-वीडियो के माध्यम से शिक्षक अपना कर्तव्य तो निभा रहे हैं लेकिन विद्यार्थी ऑनलाइन शिक्षा को कैसे ले रहे हैं, यह भविष्य बतायेगा I

आगे की राह क्या हो सकती है :

केंद्र सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की पहुँच को मज़बूत बनाने के लिये वर्ष 2022 तकदेश के 90%क्षेत्रों में हाई-स्पीड मोबाईल इंटरनेट और आगे चलकर भारतनेट योजना के माध्यम से अधिक-से-अधिक क्षेत्रों में ब्रॉडबैंड इंटरनेट की पहुँच सुनिश्चित करने का जो लक्ष्य रखा है।उसको गंभीरता से पूरा करे l

भारत के भौगोलिक विस्तार और बड़ी जनसंख्या के कारण सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करना लंबे समय से एक बड़ी चुनौती बनी हुई,अतः वर्तमान परिस्थिति से सीख लेते हुए भविष्य में इंटरनेट, मोबाईल एप और अन्य नवाचारों के माध्यम से शिक्षा की पहुँच में विस्तार को प्राथमिकता दी जानी चाहिये। इसकी राह में मौजूद विभिन्न चुनौतियों को ध्यान में रखकर ऑनलाइन शिक्षा के रूप में एक नए शिक्षण विकल्प को बढ़ावा दिया जाए।

तथ्यात्मक आकड़ों का स्रोत : MHRD,UGC,NIOS वेबसाइट

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